रवींद्रनाथ ठाकुर और अन्नपूर्णा तुर्खड : ‘नलिनी’ की अधूरी प्रेमकथा
रवींद्रनाथ ठाकुर का नाम लेते ही कविता, गीत, प्रकृति, प्रेम और मानवीय संवेदना की एक विराट दुनिया हमारे सामने खुल जाती है। लेकिन स्वयं रवींद्रनाथ के जीवन में भी कुछ ऐसे संबंध आए, जिन्होंने उनके भीतर के कवि को गहराई से छुआ। अन्नपूर्णा तुर्खड के साथ उनका संबंध ऐसा ही एक प्रसंग है—एक छोटी-सी मुलाकात, कुछ सप्ताहों की आत्मीयता और फिर जीवन भर बनी रहने वाली स्मृति।
यह कहानी इसलिए भी विशेष है कि इसमें रवींद्रनाथ केवल कवि नहीं, बल्कि सत्रह वर्ष के एक संकोची युवक के रूप में दिखाई देते हैं, जो पहली बार भारत से बाहर जाने की तैयारी कर रहा है।
मुंबई में एक मुलाकात
सन् 1878 में रवींद्रनाथ ठाकुर की उम्र केवल 17 वर्ष थी। उनके बड़े भाई सत्येंद्रनाथ ठाकुर चाहते थे कि इंग्लैंड जाने से पहले रवींद्रनाथ अंग्रेज़ी भाषा और पश्चिमी सामाजिक व्यवहार से परिचित हो जाएँ। इसी उद्देश्य से उन्हें कुछ समय के लिए मुंबई में प्रसिद्ध समाज-सुधारक और चिकित्सक डॉ. आत्माराम पांडुरंग तुर्खड के परिवार के यहाँ भेजा गया।
आत्माराम पांडुरंग केवल चिकित्सक नहीं थे। वे सामाजिक और धार्मिक सुधार के आंदोलन से जुड़े हुए थे और प्रार्थना समाज की स्थापना से उनका महत्वपूर्ण संबंध था। उनका परिवार शिक्षा और आधुनिक विचारों के लिए जाना जाता था। उनकी पुत्रियों को भी विदेश जाकर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला था।
इसी परिवार की दूसरी बेटी थीं—अन्नपूर्णा तुर्खड, जिन्हें परिवार और मित्रों के बीच ‘एना’ भी कहा जाता था।
अन्नपूर्णा रवींद्रनाथ से लगभग तीन वर्ष बड़ी थीं। वे पश्चिम में शिक्षा प्राप्त कर चुकी थीं और अंग्रेज़ी के साथ कई यूरोपीय भाषाओं से परिचित थीं। रवींद्रनाथ को अंग्रेज़ी बोलने का अभ्यास कराने की जिम्मेदारी उन्हीं पर आई।
संकोची रवींद्रनाथ और आत्मविश्वासी अन्नपूर्णा
एक ओर सत्रह वर्ष का संकोची बंगाली युवक था, दूसरी ओर लगभग बीस वर्ष की शिक्षित, स्वतंत्र विचारों वाली और आत्मविश्वासी युवती।
अन्नपूर्णा ने रवींद्रनाथ को केवल अंग्रेज़ी बोलना नहीं सिखाया। दोनों के बीच साहित्य को लेकर भी बातचीत होने लगी। रवींद्रनाथ ने उन्हें बताया कि वे कविताएँ लिखते हैं। अन्नपूर्णा ने उनकी कविताएँ सुनने और समझने में रुचि दिखाई।
यहीं से उनके संबंध में एक नया आयाम आया।
रवींद्रनाथ अपनी कविताएँ उन्हें सुनाते और उनका अंग्रेज़ी में अनुवाद करने का अभ्यास करते। अन्नपूर्णा उनकी श्रोता बनतीं। एक स्रोत के अनुसार, अन्नपूर्णा ने रवींद्रनाथ से कहा कि वे उन्हें कोई बंगाली नाम दें। रवींद्रनाथ ने उन्हें ‘नलिनी’ नाम दिया। ‘नलिनी’ का अर्थ कमलिनी अर्थात् कमल से जुड़ी स्त्री है। यह नाम रवींद्रनाथ की आरंभिक रचनाओं में पहले से भी आता था, लेकिन अन्नपूर्णा के साथ जुड़कर यह नाम उनके लिए एक जीवंत स्मृति बन गया।
‘नलिनी’ कौन थी?
रवींद्रनाथ की आरंभिक रचनाओं में ‘नलिनी’ नाम बार-बार दिखाई देता है। अन्नपूर्णा के जीवन से जुड़े स्रोतों के अनुसार, मुंबई में उनके साथ बिताए समय के बाद यह नाम और अधिक निजी अर्थ ग्रहण कर गया।
रवींद्रनाथ ने ‘नलिनी’ नाम से जुड़े गीत भी लिखे। उदाहरण के लिए, उनके एक गीत में पुकार आती है—
“शुन नलिनी, खोल गो आँखि...”
अर्थात्—“सुनो नलिनी, अपनी आँखें खोलो...”
हालाँकि किसी एक कविता या गीत को सीधे अन्नपूर्णा के लिए लिखा गया मान लेना हमेशा ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित नहीं है। ‘नलिनी’ रवींद्रनाथ की कल्पना में पहले से उपस्थित एक काव्यात्मक नाम था। लेकिन अन्नपूर्णा से मुलाकात के बाद उस नाम को वास्तविक मानवीय रूप मिल गया—यह व्याख्या टैगोर के जीवन पर शोध करने वाले विद्वानों के बीच महत्वपूर्ण रही है।
क्या रवींद्रनाथ सचमुच अन्नपूर्णा से प्रेम करते थे?
यही इस कहानी का सबसे आकर्षक और सबसे विवादास्पद प्रश्न है।
कुछ जीवनीकारों और लेखकों ने इस संबंध को रवींद्रनाथ का प्रारंभिक प्रेम माना है। एक अकादमिक लेख में भी अन्नपूर्णा को रवींद्रनाथ की 1878–79 की ‘love interest’ के रूप में संदर्भित किया गया है।
लेकिन दूसरी ओर, हमारे पास ऐसा निर्णायक प्रमाण नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि दोनों के बीच आधुनिक अर्थों वाला प्रेम-संबंध या कोई औपचारिक प्रणय-संबंध स्थापित था।
अधिक सुरक्षित ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है कि दोनों के बीच गहरी आत्मीयता, आकर्षण, साहित्यिक निकटता और भावनात्मक प्रभाव था। बाद के वर्षों में अन्नपूर्णा रवींद्रनाथ की स्मृति में ‘नलिनी’ के रूप में बनी रहीं। Scottish Centre of Tagore Studies भी उन्हें रवींद्रनाथ के जीवन की एक विशेष उपस्थिति और उनकी काव्य-प्रेरणा से जुड़ी शख्सियत के रूप में प्रस्तुत करता है।
दो कवि-मन और एक छोटी-सी दुनिया
मुंबई के तुर्खड परिवार में बिताया गया समय बहुत लंबा नहीं था। लेकिन इन थोड़े से दिनों में रवींद्रनाथ को एक ऐसी साथी मिली, जिसके साथ वे कविता पर बात कर सकते थे।
रवींद्रनाथ अपनी कविताएँ पढ़ते थे और अन्नपूर्णा उन्हें सुनती थीं। अन्नपूर्णा बंगाली सीखने लगीं और रवींद्रनाथ अंग्रेज़ी सीख रहे थे।
इस तरह दोनों के बीच भाषा का भी एक सुंदर आदान-प्रदान हुआ।
वह उन्हें अंग्रेज़ी सिखा रही थीं और वे उन्हें बंगला सिखा रहे थे।
शायद यही इस कहानी का सबसे सुंदर पक्ष है—दो अलग भाषाओं और संस्कृतियों से आए दो युवा एक-दूसरे के माध्यम से एक नई दुनिया खोज रहे थे।
विदा का क्षण
सितंबर 1878 में रवींद्रनाथ इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए। 20 सितंबर को उन्होंने बंबई से जहाज द्वारा अपनी पहली विदेश यात्रा शुरू की।
यह विदाई कितनी भावुक रही होगी, इसका पूरा विवरण हमारे पास नहीं है। लेकिन इतना निश्चित है कि मुंबई में मिला यह अनुभव रवींद्रनाथ के जीवन से मिटा नहीं।
इंग्लैंड चले जाने के बाद भी अन्नपूर्णा से उनका साहित्यिक संपर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। रवींद्रनाथ के बड़े भाई ज्योतिरिंद्रनाथ ने उनकी पुस्तक ‘कवि-काहिनी’ की एक प्रति अन्नपूर्णा को भेजी। अन्नपूर्णा ने उत्तर में प्रसन्नता व्यक्त की और बताया कि रवींद्रनाथ ने उन्हें अपनी कविताएँ पढ़कर और उनका अनुवाद करके सुनाया था, यहाँ तक कि वे उन्हें याद कर चुकी थीं।
अन्नपूर्णा का विवाह
रवींद्रनाथ के इंग्लैंड चले जाने के लगभग दो वर्ष बाद अन्नपूर्णा ने हेरॉल्ड लिटलडेल से विवाह किया। विवाह 11 नवंबर 1880 को हुआ। लिटलडेल शिक्षा और अंग्रेज़ी साहित्य से जुड़े विद्वान थे और बाद में बड़ौदा में शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत रहे। अन्नपूर्णा ने पारिवारिक जीवन बिताया और उनके बच्चे भी हुए।
इस बीच रवींद्रनाथ का जीवन भी आगे बढ़ता गया।
1883 में उनका विवाह भवतारिणी देवी से हुआ, जिन्हें उन्होंने बाद में मृणालिनी देवी नाम दिया।
यहाँ एक रोचक साहित्यिक समानता दिखाई देती है—नलिनी और मृणालिनी, दोनों नाम रवींद्रनाथ के जीवन में महत्वपूर्ण रहे। कुछ लेखकों ने दोनों नामों के बीच संबंध की संभावना पर चर्चा की है, लेकिन इसे निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा।
एक अधूरी स्मृति
अन्नपूर्णा का जीवन बहुत लंबा नहीं रहा। 1891 में मात्र 33 वर्ष की आयु में एडिनबर्ग में उनका निधन हो गया। उनके जीवन के अंतिम समय, उनकी बीमारी और उनके परिवार से जुड़े विवरणों पर बाद में शोध हुआ है। एडिनबर्ग के मॉर्निंगसाइड कब्रिस्तान में उनके और उनके शिशु पुत्र डेंज़िल के समाधि-स्थल की पहचान की गई और 2023 में उनकी स्मृति में एक पट्टिका भी लगाई गई।
इस तरह रवींद्रनाथ से उनकी मुलाकात के केवल लगभग तेरह वर्ष बाद अन्नपूर्णा इस संसार से चली गईं।
लेकिन ‘नलिनी’ उनके जीवन और साहित्य की स्मृति में बनी रही।
प्रेम या प्रेरणा?
रवींद्रनाथ और अन्नपूर्णा की कहानी को केवल ‘प्रेमकहानी’ कह देना शायद इसे छोटा कर देना होगा।
यह कहानी एक ऐसे युवा कवि की कहानी है, जिसने पहली बार अपने से भिन्न सांस्कृतिक वातावरण की एक शिक्षित और स्वतंत्र विचारों वाली युवती को निकट से जाना।
यह भाषा सीखने की कहानी है।
यह कविता सुनाने और कविता समझने की कहानी है।
यह एक ऐसे नाम की कहानी है—‘नलिनी’—जो वास्तविक स्त्री और काव्य-कल्पना के बीच पुल बन गया।
और सबसे बढ़कर यह उस उम्र की कहानी है जब मन में उत्पन्न कोई आत्मीयता बहुत छोटी अवधि में भी जीवनभर की स्मृति बन सकती है।
रवींद्रनाथ के जीवन में बाद में अनेक लोग आए। उन्होंने विवाह किया, परिवार बनाया, विश्वकवि बने और प्रेम, विरह तथा मानवीय संबंधों पर असंख्य कविताएँ और गीत लिखे।
लेकिन मुंबई में 1878 का वह छोटा-सा अध्याय अलग रहा।
सत्रह वर्ष का रवींद्रनाथ इंग्लैंड जाने से पहले मुंबई आया था अंग्रेज़ी सीखने; वहाँ उसे अन्नपूर्णा मिलीं। उसने उन्हें एक नाम दिया—‘नलिनी’।
शायद वह नहीं जानता था कि यह नाम उसके अपने कवि-मन में इतनी लंबी यात्रा करेगा।
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