राष्ट्रकवि दिनकर : उपाधि, साहित्यिक प्रतिष्ठा और उसकी निर्मिति
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी साहित्य के उन विरल कवियों में हैं जिनकी पहचान उनकी रचनाओं से आगे बढ़कर एक सार्वजनिक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में निर्मित हुई। उन्हें सामान्यतः ‘राष्ट्रकवि’ कहा जाता है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सरकारी प्रकाशनों, साहित्यिक संस्थाओं और जनस्मृति में ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ एक लगभग स्थिर संबोधन बन चुका है। किंतु जब इस संबोधन को आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाता है तो कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं—दिनकर को ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि आखिर किसने दी? क्या यह कोई औपचारिक उपाधि थी? यदि नहीं, तो इसका प्रचलन कैसे हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण, जब मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सोहनलाल द्विवेदी आदि अनेक कवियों के काव्य में राष्ट्रीय चेतना अत्यंत प्रबल थी, तो ‘राष्ट्रकवि’ संबोधन दिनकर के साथ ही इतनी स्थायी शक्ति से क्यों जुड़ गया?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल दिनकर की राष्ट्रवादी कविताओं में खोजने से नहीं मिलेगा। इसके लिए साहित्य, राजनीति, सार्वजनिक जीवन, आलोचना, लोकप्रियता और साहित्यिक स्मृति—इन सभी को एक साथ देखना होगा।
‘राष्ट्रकवि’ : उपाधि या साहित्यिक संबोधन?
सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ‘राष्ट्रकवि’ भारत सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली कोई संवैधानिक अथवा वैधानिक उपाधि नहीं है। दिनकर को ‘राष्ट्रकवि’ बनाए जाने संबंधी किसी सरकारी अधिसूचना, राजकीय सम्मान अथवा औपचारिक उपाधि-प्रदान समारोह का विश्वसनीय प्राथमिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। उनके साहित्यिक सम्मान अलग-अलग हैं—साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और बाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार—लेकिन इनमें से कोई भी ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि प्रदान करने वाला सम्मान नहीं था।
इस दृष्टि से ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ को एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संबोधन मानना अधिक उचित है। बाद के साहित्यिक और सरकारी स्रोतों ने इस संबोधन को स्वीकार किया और दोहराया, जिसके परिणामस्वरूप यह दिनकर की सार्वजनिक पहचान का स्थायी हिस्सा बन गया।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए। किसी व्यक्ति को औपचारिक रूप से पुरस्कार या उपाधि प्रदान की जाती है तो उसका प्रमाण सामान्यतः उपलब्ध होता है। लेकिन जब कोई विशेषण साहित्यिक समाज में धीरे-धीरे लोकप्रिय होता है, तो उसकी शुरुआत का निर्धारण कठिन होता है। ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ के मामले में उपलब्ध प्रमाण फिलहाल दूसरी स्थिति की ओर संकेत करते हैं।
राष्ट्रीय चेतना और दिनकर
इसमें कोई संदेह नहीं कि दिनकर राष्ट्रीय चेतना के अत्यंत प्रभावशाली कवि थे। उनकी आरंभिक रचनाएँ स्वतंत्रता आंदोलन के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में विकसित हुईं। रेणुका, हुंकार, द्वंद्वगीत आदि में पराधीनता के विरुद्ध असंतोष, आत्मसम्मान, संघर्ष और स्वाधीनता की आकांक्षा दिखाई देती है।
उनकी कविता में राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं है। उसमें इतिहास, संस्कृति, जनता, सामाजिक न्याय और सामूहिक स्मृति शामिल हैं। यही कारण है कि दिनकर का राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक नारे में सीमित नहीं रहता।
कुरुक्षेत्र इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसका प्रकाशन 1946 में हुआ। महाभारत के शांति-पर्व की पृष्ठभूमि में दिनकर ने युद्ध, शांति, न्याय और मनुष्य के नैतिक दायित्व का प्रश्न उठाया। उपलब्ध आलोचनात्मक सामग्री भी इसे केवल पौराणिक आख्यान का पुनर्लेखन न मानकर अपने समय के युद्ध और हिंसा से संबंधित चिंतन के रूप में देखती है।
इस प्रकार दिनकर के यहाँ राष्ट्रवाद केवल ‘देश महान है’ जैसी भावात्मक घोषणा नहीं है। उसमें यह प्रश्न भी है कि राष्ट्र कैसा हो, उसके भीतर न्याय कितना हो और मनुष्य की स्वतंत्रता तथा गरिमा का स्थान क्या हो।
लेकिन यही गुण दूसरे कवियों में भी थे
यहीं से हमारे मूल प्रश्न की शुरुआत होती है।
यदि ‘राष्ट्रकवि’ होने की पहली कसौटी राष्ट्रीय भावना है, तो दिनकर अकेले उम्मीदवार नहीं हो सकते। मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती ने राष्ट्रीय चेतना को व्यापक रूप दिया। माखनलाल चतुर्वेदी की कविताओं में स्वतंत्रता और बलिदान का स्वर अत्यंत तीव्र है। सुभद्रा कुमारी चौहान की ‘झाँसी की रानी’ जैसी कविता राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बन चुकी है। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और सोहनलाल द्विवेदी भी राष्ट्रीय काव्यधारा के महत्वपूर्ण स्वर हैं।
इसलिए केवल यह कहना कि “दिनकर राष्ट्रभक्ति की कविता लिखते थे, इसलिए वे राष्ट्रकवि कहलाए”—पर्याप्त उत्तर नहीं है।
प्रश्न यह होना चाहिए कि दिनकर की राष्ट्रीयता में ऐसी कौन-सी विशेषता थी जिसने उनके नाम के साथ ‘राष्ट्रकवि’ को स्थायी बना दिया?
दिनकर की विशिष्टता : राष्ट्रवाद से आगे
दिनकर की सबसे बड़ी विशेषता शायद उनकी राष्ट्रीय चेतना का विस्तार है। वे राष्ट्रवाद को सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक इतिहास, युद्ध और शांति, सत्ता और जनता, परंपरा और आधुनिकता जैसे प्रश्नों से जोड़ते हैं।
रश्मिरथी में कर्ण के माध्यम से जन्म और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न सामने आता है। कर्ण केवल पौराणिक पात्र नहीं रहता; वह सामाजिक व्यवस्था में उपेक्षित मनुष्य का प्रतीक बन जाता है।
कुरुक्षेत्र में युद्ध की समस्या है। परशुराम की प्रतीक्षा में सामाजिक और राजनीतिक बेचैनी का स्वर है। संस्कृति के चार अध्याय में भारतीय संस्कृति के निर्माण की दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया को समझने का प्रयास है।
इसलिए दिनकर का साहित्य राष्ट्रवादी कविता से कहीं अधिक विस्तृत है। उनकी राष्ट्रीयता में इतिहास-बोध और सांस्कृतिक चिंतन भी है।
यही शायद ‘राष्ट्रकवि’ संबोधन को उनके साथ स्थायी बनाने वाले प्रमुख तत्वों में से एक है।
1960 का एक महत्वपूर्ण संकेत : ‘लोकप्रिय कवि दिनकर’
दिनकर की कृतियों की सूची में 1960 की एक पुस्तक लोकप्रिय कवि दिनकर के नाम से दर्ज है।
यह तथ्य मामूली दिखाई दे सकता है, लेकिन साहित्यिक प्रतिष्ठा के इतिहास के लिए यह महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि दिनकर की सार्वजनिक पहचान को एक समय ‘लोकप्रिय कवि’ के रूप में भी व्यक्त किया जा रहा था।
अर्थात दिनकर की प्रतिष्ठा को समझने के लिए ‘राष्ट्रकवि’ के साथ-साथ ‘लोकप्रिय कवि’ की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है।
उनकी कविता मंच पर पढ़ी जाती थी, जनता में लोकप्रिय थी और राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों में उद्धृत होती थी। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी ओज, लय और वक्तृत्व के कारण जनसंचार की क्षमता रखती थी। इससे उनका कवि-व्यक्तित्व साहित्यिक मंडली से बाहर व्यापक सार्वजनिक क्षेत्र में पहुँचा।
स्वतंत्रता के बाद दिनकर की सार्वजनिक भूमिका
दिनकर की प्रतिष्ठा केवल साहित्य तक सीमित नहीं रही। 1952 में वे राज्यसभा के सदस्य बने। स्वतंत्र भारत के सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति ने उनके कवि-व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया।
यहाँ सावधानी जरूरी है। राज्यसभा सदस्य होना अपने-आप ‘राष्ट्रकवि’ होने का कारण नहीं है। लेकिन यह तथ्य अवश्य महत्वपूर्ण है कि दिनकर केवल कविता लिखने वाले साहित्यकार नहीं रहे; वे स्वतंत्र भारत के सार्वजनिक बौद्धिक जीवन का हिस्सा बने।
उन्होंने राष्ट्रभाषा, राष्ट्रीय एकता, संस्कृति और भारतीय इतिहास जैसे विषयों पर भी व्यापक लेखन किया। राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता, हमारी सांस्कृतिक एकता और संस्कृति के चार अध्याय जैसी कृतियाँ इस व्यापक वैचारिक रुचि का प्रमाण हैं।
इस प्रकार उनके कवि-व्यक्तित्व और सार्वजनिक बौद्धिक व्यक्तित्व के बीच एक निरंतरता दिखाई देती है।
मैथिलीशरण गुप्त और दिनकर : एक महत्वपूर्ण अंतर
‘राष्ट्रकवि’ शब्द के इतिहास में मैथिलीशरण गुप्त का उदाहरण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। गुप्त के लिए महात्मा गांधी से जुड़ी ‘राष्ट्रकवि’ संबोधन की स्पष्ट परंपरा मिलती है। इसके विपरीत दिनकर के मामले में किसी एक व्यक्ति द्वारा औपचारिक रूप से उपाधि दिए जाने का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
गुप्त के मामले में हम पूछ सकते हैं—गांधी ने उन्हें यह संबोधन किस संदर्भ में दिया? लेकिन दिनकर के मामले में प्रश्न बदल जाता है—किस साहित्यिक और सामाजिक प्रक्रिया ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ बना दिया?
बाद के कुछ लेखकों ने लिखा है कि गुप्त को गांधी से यह संबोधन मिला, जबकि दिनकर को हिंदी समाज ने ‘राष्ट्रकवि’ माना। लेकिन इस दावे को भी सावधानी से पढ़ना चाहिए, क्योंकि यह किसी समकालीन 1940 या 1950 के प्राथमिक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
इसलिए ‘हिंदी समाज ने दिया’ को अभी साहित्यिक परंपरा की व्याख्या कहना अधिक उचित होगा, न कि किसी औपचारिक उपाधि-प्रदान की ऐतिहासिक घटना।
दिनकर की अपनी डायरी : सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण
इस पूरे प्रश्न में शायद सबसे रोचक प्रमाण स्वयं दिनकर की डायरी से मिलता है।
24 जून 1971 को उन्होंने लिखा—
“राष्ट्रकवि किसे कहना चाहिए?”
इसके बाद वे इस धारणा की आलोचना करते हैं कि जो कवि राष्ट्रीय कविताएँ लिखता है, उसे राष्ट्रकवि कह दिया जाए। उनके अनुसार यह पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक जाति अथवा राष्ट्र की एक आध्यात्मिक विशेषता और सांस्कृतिक दृष्टि होती है। जो कवि उस विशिष्ट दृष्टिबोध को अभिव्यक्ति दे सके, वही वास्तविक अर्थ में राष्ट्रकवि कहलाने योग्य है।
यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
क्योंकि यहाँ दिनकर ‘राष्ट्रकवि’ की परिभाषा को स्वयं व्यापक कर रहे हैं। उनके लिए राष्ट्रकवि केवल राष्ट्रभक्ति का कवि नहीं है। वह राष्ट्र के गहरे सांस्कृतिक अनुभव को अभिव्यक्त करने वाला कवि है।
और उससे भी अधिक रोचक बात यह है कि उपलब्ध प्रतिलेख के अनुसार उन्होंने इस विचार के संदर्भ में मैथिलीशरण गुप्त आदि कवियों का उल्लेख किया, लेकिन अपना नाम उस सूची में नहीं रखा।
यह आत्म-सजगता दिनकर के व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पक्ष है।
क्या दिनकर स्वयं ‘राष्ट्रकवि’ कहलाना चाहते थे?
इस प्रश्न का सीधा उत्तर देने के लिए और प्राथमिक सामग्री की आवश्यकता है। लेकिन 1971 की डायरी से इतना स्पष्ट है कि दिनकर ‘राष्ट्रकवि’ शब्द को गंभीर साहित्यिक कसौटी से जोड़कर देखते थे।
इससे दो संभावनाएँ बनती हैं।
पहली, वे इस संबोधन को केवल लोकप्रिय प्रशंसा के रूप में स्वीकार करते रहे हों, लेकिन उसके लिए अपनी अलग साहित्यिक कसौटी रखते हों।
दूसरी, वे स्वयं इस बात को लेकर अधिक सजग रहे हों कि ‘राष्ट्रकवि’ की संज्ञा को बहुत आसानी से इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
दोनों ही स्थितियों में यह प्रमाण हमारी पारंपरिक धारणा को जटिल बनाता है।
‘राष्ट्रकवि’ की निर्मिति में लोकप्रियता की भूमिका
दिनकर की लोकप्रियता इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उनकी कविताएँ केवल पुस्तकों में नहीं रहीं। वे कवि-सम्मेलनों, सार्वजनिक मंचों और भाषणों के माध्यम से जनस्मृति में पहुँचीं। उनकी पंक्तियाँ राजनीतिक और सामाजिक प्रसंगों में उद्धृत होती रहीं।
“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” जैसी पंक्तियाँ कवि को पुस्तकालय से निकालकर सार्वजनिक जीवन में ले जाती हैं।
यहाँ ‘राष्ट्रकवि’ की निर्मिति में कविता + मंच + जनस्वीकृति + सार्वजनिक व्यक्तित्व का सम्मिलन दिखाई देता है।
यह प्रक्रिया मैथिलीशरण गुप्त या माखनलाल चतुर्वेदी की प्रतिष्ठा से पूरी तरह अलग नहीं थी, लेकिन दिनकर के मामले में इसका विस्तार विशेष रूप से व्यापक हुआ।
सत्ता के निकटता का प्रश्न
दिनकर की ‘राष्ट्रकवि’ छवि पर विचार करते समय उनकी स्वतंत्र भारत की राजनीतिक-सार्वजनिक भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे राज्यसभा के सदस्य रहे और राष्ट्रीय जीवन के अनेक संस्थागत क्षेत्रों से जुड़े।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है।
यह कहना कि “सरकार के निकट होने के कारण उन्हें राष्ट्रकवि बनाया गया” अभी प्रमाणित निष्कर्ष नहीं है।
दूसरी ओर यह कहना भी पर्याप्त नहीं होगा कि उनकी सार्वजनिक भूमिका का उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा।
सही शोध-पद्धति यह होगी कि दिनकर की राजनीतिक-सार्वजनिक भूमिका, साहित्यिक प्रतिष्ठा और ‘राष्ट्रकवि’ संबोधन के प्रसार की तिथियों को साथ रखकर देखा जाए। यदि किसी समय विशेष में सरकारी संस्थाओं, साहित्यिक संस्थाओं और लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं में यह संबोधन तेजी से बढ़ता है, तो वह साहित्यिक प्रतिष्ठा के संस्थानीकरण की प्रक्रिया को समझने में सहायक होगा।
‘राष्ट्रकवि’ और साहित्यिक स्मृति
किसी कवि की साहित्यिक प्रतिष्ठा केवल उसकी रचनाओं से नहीं बनती। आलोचक, विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, पुरस्कार, साहित्यिक संस्थाएँ, स्मृति-ग्रंथ, सरकारी प्रकाशन और लोकप्रिय संस्कृति मिलकर किसी लेखक की सार्वजनिक छवि बनाते हैं।
दिनकर के मामले में यह प्रक्रिया विशेष रूप से प्रभावशाली रही।
उनकी मृत्यु के बाद ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ संबोधन और अधिक मजबूत हुआ। बाद के स्मृति-ग्रंथों और साहित्यिक लेखों में यह उनका लगभग स्थायी परिचय बन गया। उदाहरण के लिए दिनकर पर प्रकाशित स्मृति-साहित्य में ‘राष्ट्रकवि’ उनके व्यक्तित्व की केंद्रीय पहचान के रूप में प्रयुक्त होता है।
अर्थात संभव है कि ‘राष्ट्रकवि’ संबोधन का सबसे महत्वपूर्ण चरण वह न हो जब पहली बार किसी ने यह शब्द कहा, बल्कि वह प्रक्रिया हो जिसमें समाज ने उस संबोधन को बार-बार दोहराकर उसे स्थायी पहचान बना दिया।
क्या ‘राष्ट्रकवि’ कहना साहित्यिक रूप से उचित है?
इस प्रश्न का उत्तर दो स्तरों पर दिया जा सकता है।
यदि ‘राष्ट्रकवि’ का अर्थ है—ऐसा कवि जिसकी कविता में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक स्मृति, जनजीवन, इतिहास और स्वतंत्रता का व्यापक स्वर हो—तो दिनकर इस संज्ञा के अत्यंत मजबूत उदाहरण हैं।
लेकिन यदि ‘राष्ट्रकवि’ का अर्थ है—अपने समय का अकेला या सर्वोच्च राष्ट्रीय कवि—तो यह दावा ऐतिहासिक और साहित्यिक दोनों दृष्टियों से कठिन हो जाता है।
क्योंकि हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना की कोई एक परंपरा नहीं थी। गुप्त, चतुर्वेदी, सुभद्रा, नवीन, द्विवेदी और अन्य कवियों ने अपने-अपने ढंग से राष्ट्रीय अनुभव को अभिव्यक्ति दी।
इसलिए ‘राष्ट्रकवि’ को एकमात्र श्रेष्ठता-सूचक पदवी के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा।
दिनकर की वास्तविक विशिष्टता
दिनकर की वास्तविक विशिष्टता शायद ‘राष्ट्रभक्ति’ में नहीं, बल्कि राष्ट्र, संस्कृति, इतिहास, शक्ति, न्याय और मनुष्य के प्रश्नों को एक ही काव्यात्मक धरातल पर जोड़ने में है।
उनकी कविता में वीरता है, लेकिन केवल वीरता नहीं।
उसमें विद्रोह है, लेकिन केवल विद्रोह नहीं।
उसमें राष्ट्रवाद है, लेकिन केवल राष्ट्रवाद नहीं।
उसमें इतिहास है, लेकिन केवल अतीत का गौरव नहीं।
उसमें मिथक हैं, लेकिन केवल पौराणिक पुनरावृत्ति नहीं।
और उसमें सत्ता के प्रति संवाद है, लेकिन केवल सत्ता-समर्थन नहीं।
इसी व्यापकता के कारण ‘राष्ट्रकवि’ संबोधन उनके लिए एक अर्थपूर्ण साहित्यिक संज्ञा बन सकता है—बशर्ते इसे दूसरों को छोटा करने वाली उपाधि न बनाया जाए।
निष्कर्ष
रामधारी सिंह दिनकर को ‘राष्ट्रकवि’ कहने का इतिहास अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह कहना कठिन है कि किसी एक व्यक्ति ने किसी निश्चित तारीख को उन्हें यह उपाधि प्रदान की थी। न ही इसे भारत सरकार की औपचारिक उपाधि माना जा सकता है।
अधिक संभावित व्याख्या यह है कि स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय चेतना, दिनकर की ओजस्वी कविता, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी और अन्य रचनाओं की व्यापक लोकप्रियता, स्वतंत्र भारत में उनकी सार्वजनिक भूमिका, सांस्कृतिक लेखन और हिंदी समाज में उनकी निरंतर प्रतिष्ठा ने मिलकर ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ की छवि का निर्माण किया।
लेकिन इस निष्कर्ष को अंतिम ऐतिहासिक सत्य मानने से पहले एक प्रश्न अभी खुला है—“राष्ट्रकवि दिनकर” का सबसे पहला समकालीन मुद्रित प्रयोग कहाँ मिलता है?
यदि 1946 से 1960 के बीच किसी पत्रिका, अखबार, पुस्तक, कवि-सम्मेलन की रिपोर्ट या साहित्यिक संस्मरण में यह संबोधन मिल जाए, तो इस उपाधि के इतिहास को अधिक ठोस रूप से समझा जा सकेगा।
इसलिए फिलहाल सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि दिनकर ‘राष्ट्रकवि’ किसी एक औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि एक दीर्घ साहित्यिक-सामाजिक प्रक्रिया में बने।
और इस पूरी प्रक्रिया का सबसे रोचक दस्तावेज स्वयं दिनकर की 24 जून 1971 की डायरी है। जिस कवि को हिंदी समाज ‘राष्ट्रकवि’ कह रहा था, वही कवि बैठकर पूछ रहा था—“राष्ट्रकवि किसे कहना चाहिए?”
यही प्रश्न दिनकर की ‘राष्ट्रकवि’ छवि को श्रद्धापूर्ण स्वीकार से निकालकर आलोचनात्मक अध्ययन का विषय बना देता है।
अतः दिनकर को ‘राष्ट्रकवि’ कहना अनुचित नहीं है, लेकिन इसे ऐतिहासिक रूप से प्रदत्त आधिकारिक उपाधि मानना उचित नहीं होगा। अधिक सटीक रूप से कहा जा सकता है कि ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ हिंदी समाज द्वारा निर्मित और समय के साथ संस्थागत रूप से स्वीकृत साहित्यिक-सांस्कृतिक पहचान है।
और शायद यही इस संबोधन की सबसे बड़ी विशेषता भी है—यह किसी एक व्यक्ति की मुहर से नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली सामूहिक साहित्यिक स्मृति से निर्मित हुआ।
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