स्त्री और कामू : अस्तित्व, देह, मौन और प्रतिरोध का प्रश्न
प्रस्तावना
बीसवीं शताब्दी के फ्रांसीसी साहित्य में अल्बेर कामू (Albert Camus, 1913–1960) का नाम उन लेखकों और चिंतकों में लिया जाता है जिन्होंने आधुनिक मनुष्य की निरर्थकता, अकेलेपन, स्वतंत्रता, नैतिक दुविधा और विद्रोह को नई दार्शनिक संवेदना प्रदान की। द मिथ ऑफ सिसिफस, द स्ट्रेंजर, द प्लेग, द फॉल, द रिबेल और द फर्स्ट मैन जैसी रचनाओं में कामू मनुष्य और संसार के बीच उपस्थित असंगति को रेखांकित करते हैं। उनके लिए जीवन की “असंगति” अथवा “एब्सर्ड” (Absurd) का जन्म मनुष्य की अर्थ पाने की आकांक्षा और संसार की चुप्पी के टकराव से होता है।
कामू का चिंतन सामान्यतः “मनुष्य” के अस्तित्वगत संकट के रूप में पढ़ा गया है, परंतु नारीवादी दृष्टि से यह पूछना आवश्यक है कि उनके साहित्य में जिस मनुष्य की स्वतंत्रता, पीड़ा और विद्रोह की चर्चा होती है, उसमें स्त्री कहाँ उपस्थित है। क्या स्त्री स्वयं एक स्वतंत्र अस्तित्वगत चेतना है अथवा वह पुरुष नायक के प्रेम, कामना, स्मृति और अकेलेपन को अभिव्यक्त करने का माध्यम मात्र बन जाती है? कामू के साहित्य में स्त्रियाँ संख्या और कथात्मक विस्तार की दृष्टि से सीमित दिखाई देती हैं, फिर भी उनके मौन, श्रम, प्रेम, अनुपस्थिति और करुणा में ऐसी अर्थवत्ता छिपी है जो कामू के दर्शन को नया आयाम देती है।
कामू का अस्तित्व-बोध और स्त्री का प्रश्न
कामू स्वयं को परंपरागत अर्थ में अस्तित्ववादी दार्शनिक नहीं मानते थे, फिर भी उनका साहित्य आधुनिक अस्तित्वगत प्रश्नों से गहराई से जुड़ा हुआ है। मनुष्य स्वतंत्र है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता किसी सुनिश्चित ईश्वरीय व्यवस्था अथवा अंतिम सत्य से संचालित नहीं होती। उसे अर्थहीन दिखाई देने वाले संसार में अपने आचरण का अर्थ स्वयं निर्मित करना पड़ता है। इसी स्थिति से विद्रोह, उत्तरदायित्व और मानवीय एकजुटता की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
इस दर्शन को स्त्री के अनुभव से जोड़ने पर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। यदि संसार सभी मनुष्यों के लिए असंगत है, तो क्या स्त्री और पुरुष उस असंगति का अनुभव समान रूप से करते हैं? स्त्री को केवल ब्रह्मांड की उदासीनता का सामना नहीं करना पड़ता; उसे परिवार, विवाह, लैंगिक नैतिकता, आर्थिक निर्भरता और पुरुष-सत्ता द्वारा निर्मित असमानताओं से भी संघर्ष करना पड़ता है। पुरुष पात्र जिस स्वतंत्रता को दार्शनिक समस्या के रूप में अनुभव करता है, स्त्री के लिए वही स्वतंत्रता कई बार सामाजिक अधिकार का प्रश्न बन जाती है।
कामू की रचनाओं में स्त्री के इसी द्विस्तरीय संकट को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में देखा जा सकता है। एक ओर वह अर्थहीन संसार का हिस्सा है, दूसरी ओर पुरुष-प्रधान सामाजिक संरचना उसके अनुभव और वाणी को सीमित करती है।
द स्ट्रेंजर की मारी : प्रेम, देह और भावनात्मक असमानता
कामू के उपन्यास द स्ट्रेंजर का नायक मर्सो आधुनिक साहित्य के सबसे चर्चित पात्रों में से एक है। वह सामाजिक भावुकता, नैतिक अभिनय और परंपरागत जीवन-मूल्यों से लगभग असंबद्ध दिखाई देता है। उपन्यास की स्त्री-पात्र मारी कार्डोना उसके जीवन में प्रेम, देह, आनंद और विवाह की संभावना लेकर आती है।
मारी मर्सो के प्रति प्रेम व्यक्त करती है और उससे विवाह करना चाहती है। मर्सो का उत्तर भावनात्मक प्रतिबद्धता से रहित है। उसके लिए विवाह का कोई विशेष अर्थ नहीं है; यदि मारी चाहती है तो वह विवाह कर सकता है। यहाँ मारी और मर्सो के बीच केवल प्रेम की मात्रा का नहीं, बल्कि अस्तित्वगत स्थिति का भी अंतर दिखाई देता है। मारी संबंध में भविष्य, स्थायित्व और पारस्परिकता खोजती है, जबकि मर्सो वर्तमान क्षण के शारीरिक सुख और संवेदनात्मक अनुभव तक सीमित रहता है।
नारीवादी दृष्टिकोण से मारी का चरित्र कुछ समस्याएँ उत्पन्न करता है। उसके विचारों, पारिवारिक जीवन, सामाजिक परिस्थितियों और आंतरिक द्वंद्व का विस्तार नहीं मिलता। पाठक उसे मुख्यतः मर्सो की दृष्टि से देखता है। उसका शरीर, हँसी, तैरना और आकर्षण बार-बार वर्णित होते हैं, पर उसकी स्वतंत्र चेतना को समान कथात्मक स्थान नहीं मिलता। इस प्रकार वह “देखने वाले पुरुष” और “देखी जाने वाली स्त्री” की संरचना में रखी जाती है।
फिर भी मारी को पूर्णतः निष्क्रिय नहीं कहा जा सकता। वह अपनी इच्छा व्यक्त करती है, विवाह का प्रस्ताव रखती है, मर्सो से प्रश्न करती है और कारावास में उससे मिलने जाती है। उसके भीतर जीवन को स्वीकार करने की ऊर्जा है। वह प्रेम और भविष्य की संभावना का प्रतिनिधित्व करती है। मर्सो की भावनात्मक उदासीनता के सामने मारी की उपस्थिति यह दिखाती है कि असंगति का बोध मनुष्य को संबंधों से मुक्त नहीं करता। किसी व्यक्ति की दार्शनिक उदासीनता दूसरे व्यक्ति के लिए भावनात्मक पीड़ा का कारण बन सकती है।
माँ की मृत्यु और स्त्री की अनुपस्थिति
द स्ट्रेंजर की शुरुआत मर्सो की माँ की मृत्यु से होती है। माँ उपन्यास में जीवित पात्र के रूप में उपस्थित नहीं है, फिर भी उसकी अनुपस्थिति पूरी कथा पर छायी रहती है। मर्सो ने अपनी माँ को वृद्धाश्रम भेज दिया था और उसके अंतिम संस्कार में सामाजिक अपेक्षाओं के अनुसार शोक प्रदर्शित नहीं करता। बाद में हत्या से अधिक उसके इसी व्यवहार को नैतिक अपराध के रूप में देखा जाता है।
यहाँ माँ एक व्यक्ति से अधिक समाज द्वारा निर्मित मातृत्व की पवित्र छवि में परिवर्तित हो जाती है। न्यायालय मर्सो और उसकी माँ के वास्तविक संबंध को समझने के स्थान पर यह तय करने लगता है कि एक आदर्श पुत्र को किस प्रकार रोना चाहिए। इस अर्थ में मृत स्त्री की स्मृति का उपयोग पुरुष को नैतिक रूप से दोषी सिद्ध करने के लिए किया जाता है। माँ की अपनी इच्छाएँ, उसका वृद्धाश्रम का जीवन और वहाँ विकसित हुए संबंध लगभग अदृश्य बने रहते हैं।
फिर भी उपन्यास संकेत देता है कि जीवन के अंतिम चरण में माँ ने नए सिरे से जीने का प्रयास किया था। यह संकेत स्त्री को केवल मातृत्व में सीमित करने से इनकार करता है। वह वृद्ध होने के बाद भी संबंध, इच्छा और जीवन की संभावना से जुड़ी व्यक्ति थी।
द प्लेग : अनुपस्थित स्त्रियाँ और करुणा की नैतिकता
द प्लेग में महामारी से ग्रस्त ओरान नगर का सार्वजनिक संसार मुख्यतः पुरुष पात्रों से निर्मित है। डॉक्टर रियू, तारू, रामबेर, ग्रां और पादरी पानलू कथा के केंद्र में हैं। स्त्रियाँ अधिकांशतः माँ, पत्नी अथवा प्रेमिका के रूप में उपस्थित होती हैं। डॉक्टर रियू की बीमार पत्नी नगर से बाहर चली जाती है, जबकि पत्रकार रामबेर अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए शहर से निकलना चाहता है। महामारी के कारण प्रेमियों और परिवारों का अलगाव उपन्यास की प्रमुख संवेदनाओं में से एक है।
स्त्रियों की भौतिक अनुपस्थिति यहाँ एक कथात्मक शक्ति बन जाती है। रामबेर की प्रेमिका प्रत्यक्ष रूप से लगभग दिखाई नहीं देती, लेकिन उसी के कारण रामबेर के सामने व्यक्तिगत सुख और सामूहिक उत्तरदायित्व का द्वंद्व उत्पन्न होता है। प्रारंभ में वह महामारी को अपना निजी मामला नहीं मानता और प्रेमिका के पास लौटना चाहता है। बाद में वह शहर में रहकर महामारी-विरोधी कार्यों में भाग लेने का निर्णय करता है। इस परिवर्तन में अनुपस्थित स्त्री प्रेम और निजी जीवन के मूल्य का प्रतीक बनती है।
डॉक्टर रियू की माँ अपेक्षाकृत शांत, संयमित और करुणामयी पात्र है। वह किसी दार्शनिक घोषणा के बिना पीड़ा के समय मनुष्य के साथ बने रहने की नैतिकता प्रस्तुत करती है। उसका मौन निष्क्रियता नहीं, बल्कि धैर्यपूर्ण सहभागिता है। पुरुष पात्र जहाँ महामारी, ईश्वर, मृत्यु और नैतिकता पर विमर्श करते हैं, वहीं माँ दैनिक जीवन की देखभाल के माध्यम से मानवीयता को बचाती है।
नारीवादी आलोचना यह प्रश्न उठा सकती है कि देखभाल, प्रतीक्षा और भावनात्मक सहारा देने का दायित्व स्त्रियों को ही क्यों सौंपा गया है। फिर भी इन स्त्री-पात्रों का योगदान गौण नहीं है। वे यह स्पष्ट करती हैं कि महामारी के विरुद्ध संघर्ष केवल चिकित्सा अथवा सार्वजनिक कार्रवाई से नहीं, बल्कि देखभाल और संबंधों की रक्षा से भी संचालित होता है।
द फॉल : पुरुष-दृष्टि और स्त्री का वस्तुकरण
द फॉल का कथाकार जाँ-बातिस्त क्लामांस अपने अतीत, नैतिक पाखंड और आत्ममुग्धता का विश्लेषण करता है। स्त्रियों के साथ उसके संबंध प्रेम और समानता पर आधारित नहीं, बल्कि विजय, आकर्षण और आत्म-संतोष से संचालित दिखाई देते हैं। वह स्त्री को स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में स्वीकार करने के बजाय अपनी पुरुष-छवि की पुष्टि के साधन के रूप में देखता है।
नदी में कूदती हुई स्त्री की घटना उपन्यास का निर्णायक क्षण है। क्लामांस उसकी पुकार सुनता है, पर सहायता के लिए नहीं लौटता। स्त्री की मृत्यु उसके आत्मबोध को विचलित करती है, किंतु उस स्त्री का नाम, इतिहास और जीवन पाठक के सामने नहीं आता। वह पुरुष के अपराध-बोध का प्रतीक बन जाती है। यह संरचना कामू के साहित्य की सीमा भी है और आलोचना का अवसर भी। स्त्री की पीड़ा कथाकार के आत्मविश्लेषण को जन्म देती है, लेकिन स्वयं पीड़ित स्त्री की आवाज अनुपस्थित रहती है।
इस प्रसंग को व्यापक सामाजिक अर्थ में देखें तो स्त्री की पुकार उस नैतिक उत्तरदायित्व की परीक्षा है जिससे आधुनिक आत्मकेंद्रित मनुष्य बचना चाहता है। क्लामांस की विफलता केवल व्यक्तिगत कायरता नहीं, बल्कि ऐसी पुरुष-सत्ता का प्रतीक है जो स्त्री को चाहती तो है, लेकिन उसकी वास्तविक पीड़ा के प्रति उत्तरदायी नहीं बनती।
नाटकों में स्त्री : इच्छा, सत्ता और प्रतिरोध
कामू के नाटकों में स्त्री-पात्र अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं। कैलिगुला की कैसोनिया शासक की हिंसा और निरंकुशता के बीच मानवीय संबंध की संभावना बचाए रखने का प्रयास करती है। वह कैलिगुला के क्रूर और विनाशकारी व्यवहार को पहचानती है, फिर भी उससे जुड़ी रहती है। उसका प्रेम सत्ता की हिंसा को समाप्त नहीं कर पाता, पर वह तानाशाह के भीतर शेष मानवीयता का सामना करता है।
द मिसअंडरस्टैंडिंग में मार्था एक जटिल स्त्री-पात्र है। वह अपनी माँ के साथ मिलकर सराय में आने वाले यात्रियों की हत्या करती है ताकि धन प्राप्त करके उस नीरस और बंद जीवन से बाहर निकल सके। उसका अपराध नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं है, लेकिन उसकी आकांक्षा—स्वतंत्रता, खुले आकाश और दूसरे जीवन की इच्छा—स्त्री की दबी हुई बेचैनी को व्यक्त करती है। वह परिस्थितियों की शिकार भी है और अपराध में सक्रिय भागीदार भी। कामू यहाँ स्त्री को केवल करुणा की मूर्ति नहीं बनाते; वे उसे इच्छा, निर्णय, हिंसा और नैतिक उत्तरदायित्व से युक्त जटिल मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
द जस्ट असैसिन्स की डोरा क्रांतिकारी संघर्ष में सक्रिय है। वह प्रेम और राजनीतिक प्रतिबद्धता के द्वंद्व से गुजरती है। उसका चरित्र दिखाता है कि स्त्री सार्वजनिक संघर्ष, विचार और बलिदान की दुनिया में भी उपस्थित हो सकती है। डोरा का प्रेम उसे कमजोर नहीं करता, बल्कि हिंसा की नैतिक सीमाओं पर विचार करने की संवेदना प्रदान करता है।
द फर्स्ट मैन की माँ : मौन की गरिमा
कामू के अधूरे आत्मकथात्मक उपन्यास द फर्स्ट मैन में माँ का चरित्र उनकी अन्य स्त्री-पात्रों की तुलना में अधिक गहरा और मार्मिक है। वह निर्धन, अशिक्षित, आंशिक रूप से श्रवण-बाधित और अत्यंत कम बोलने वाली स्त्री है। कठोर श्रम और अभाव के बीच उसका जीवन बीतता है। उसके पास अपने अनुभवों को इतिहास अथवा साहित्य में दर्ज करने की भाषा नहीं है।
कामू के लिए माँ का मौन संसार की दार्शनिक चुप्पी से भिन्न है। संसार का मौन मनुष्य के प्रश्नों का उत्तर नहीं देता, लेकिन माँ का मौन प्रेम, श्रम और सहनशीलता से भरा है। वह विचारों की अपेक्षा अपनी उपस्थिति और कर्म से अर्थ निर्मित करती है। उसके माध्यम से कामू उन गरीब और उपेक्षित लोगों की दुनिया को साहित्य में स्थान देते हैं जिनका इतिहास प्रायः लिखा नहीं जाता।
नारीवादी दृष्टि से यह चरित्र विशेष महत्त्व रखता है। माँ के पास सार्वजनिक शक्ति नहीं है, फिर भी उसकी नैतिक गरिमा लेखक की चेतना का आधार बनती है। समस्या यह है कि उसकी कहानी भी पुत्र द्वारा कही जाती है। पाठक उसके भीतर सीधे प्रवेश नहीं कर पाता। इस प्रकार उसका मौन एक ओर गरिमा और करुणा का संकेत है, तो दूसरी ओर उस सामाजिक व्यवस्था का परिणाम भी है जिसने निर्धन स्त्री को शिक्षा, भाषा और आत्माभिव्यक्ति से वंचित रखा।
कामू और नारीवादी आलोचना
कामू की रचनाओं का नारीवादी पाठ दो विपरीत निष्कर्षों के बीच संतुलन की माँग करता है। पहला निष्कर्ष यह है कि उनकी कथा-दृष्टि प्रायः पुरुष-केंद्रित है। स्त्री को अनेक बार प्रेमिका, माँ, देह, स्मृति या पुरुष के नैतिक संकट की प्रेरक शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। उसे स्वतंत्र कथावाचक अथवा दार्शनिक चेतना के रूप में अपेक्षाकृत कम स्थान प्राप्त होता है। औपनिवेशिक अल्जीरिया की अरब और स्थानीय स्त्रियों की आवाज तो और भी सीमित है। इसलिए कामू के “सार्वभौमिक मनुष्य” की अवधारणा पर लैंगिक और औपनिवेशिक दोनों दृष्टियों से प्रश्न उठाए जा सकते हैं।
दूसरा निष्कर्ष यह है कि कामू की स्त्रियाँ केवल निष्क्रिय प्रतीक नहीं हैं। मारी की जीवन-स्वीकृति, रियू की माँ की देखभाल, मार्था की मुक्ति की आकांक्षा, डोरा की राजनीतिक प्रतिबद्धता और द फर्स्ट मैन की माँ का मौन श्रम—ये सभी पुरुष पात्रों की आत्मकेंद्रित दुनिया के सामने वैकल्पिक मानवीय मूल्यों को स्थापित करते हैं। इन स्त्रियों में प्रेम सजावटी भावना नहीं, बल्कि अस्तित्व को अर्थ देने वाली शक्ति है।
कामू का विद्रोह केवल सत्ता के विरुद्ध आक्रोश नहीं, बल्कि ऐसी मर्यादा की रक्षा है जिसके आधार पर मनुष्य कहता है कि अपमान और अन्याय की एक सीमा है। इस विचार का नारीवादी विस्तार स्त्री की स्वतंत्रता, समानता और देह पर अधिकार की माँग से जुड़ सकता है। यदि प्रत्येक मनुष्य में एक ऐसी गरिमा है जिसका उल्लंघन नहीं होना चाहिए, तो स्त्री को पुरुष की इच्छा, सुविधा या दार्शनिक प्रयोग का साधन बनाना कामू की अपनी मानवीय नैतिकता के विरुद्ध सिद्ध होता है।
निष्कर्ष
अल्बेर कामू के साहित्य में स्त्री की स्थिति विरोधाभासी है। वह कथा के केंद्र से कई बार अनुपस्थित है, लेकिन उसी की अनुपस्थिति पुरुष नायक के अकेलेपन, अपराध-बोध और नैतिक संकट को उजागर करती है। वह कभी प्रेमिका, कभी माँ, कभी प्रतीक्षा करती पत्नी, कभी राजनीतिक कार्यकर्ता और कभी मुक्ति की आकांक्षा से भरी विद्रोही स्त्री के रूप में सामने आती है।
कामू की स्त्रियों को केवल यह कहकर अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वे पुरुष-केंद्रित साहित्य की गौण पात्र हैं। उनके मौन और सीमित उपस्थिति को आलोचनात्मक ढंग से पढ़ने पर उस सामाजिक इतिहास का पता चलता है जिसमें स्त्रियों का श्रम दिखाई नहीं देता, उनका प्रेम स्वाभाविक मान लिया जाता है और उनकी पीड़ा पुरुष के आत्मबोध का माध्यम बन जाती है। साथ ही यही पात्र करुणा, संबंध, देखभाल और जीवन की स्वीकृति के माध्यम से कामू के निरर्थक संसार में अर्थ की संभावना भी निर्मित करते हैं।
अतः “स्त्री और कामू” का अध्ययन कामू की रचनाओं में स्त्री-पात्रों की सूची तैयार करना भर नहीं है। यह उनके दर्शन से प्रश्न करने और उसे विस्तृत करने की आलोचनात्मक प्रक्रिया है। कामू ने मनुष्य को ब्रह्मांड की चुप्पी के सामने खड़ा किया; नारीवादी पाठ उस मनुष्य से पूछता है कि क्या उसने अपने पास खड़ी स्त्री की आवाज भी सुनी है। यही प्रश्न कामू के साहित्य को आज के लैंगिक विमर्श में प्रासंगिक बनाता है। उनकी रचनाएँ स्त्री-मुक्ति का व्यवस्थित दर्शन प्रस्तुत नहीं करतीं, पर वे ऐसे मौन, अनुपस्थिति और नैतिक विफलताओं को सामने लाती हैं जिनके भीतर स्त्री-अस्मिता के गंभीर प्रश्न पढ़े जा सकते हैं।
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