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सत्ता, स्मृति और मानवीय न्याय की उज्बेकी कहानी : ‘पिस्ता वाला’

 









सत्ता, स्मृति और मानवीय न्याय की कहानी : ‘पिस्ता वाला’

‘पिस्ता वाला’ एक ऐसी मार्मिक यथार्थवादी कहानी है, जिसमें लेखक ने एक साधारण पिस्ता-विक्रेता के वर्तमान जीवन के माध्यम से उसके क्रूर अतीत, सत्ता के दुरुपयोग और समय के न्याय को उद्घाटित किया है। कहानी का बाहरी कथानक अत्यंत सामान्य दिखाई देता है—बाज़ार के प्रवेश-द्वार पर बैठा एक वृद्ध और अपाहिज व्यक्ति पिस्ता तथा कुरुत बेचता है—लेकिन इस सामान्य दृश्य के पीछे शोषण, अपमान, पारिवारिक पीड़ा, पश्चात्ताप और स्मृति की एक जटिल कथा छिपी हुई है।

कथा-सार

कहानी के आरम्भ में कथावाचक बाज़ार के बाहर बैठे एक पिस्ता-विक्रेता का चित्र प्रस्तुत करता है। वह छोटी-सी कुर्सी पर बैठता है। उसके सामने पिस्ते और सूखे दही से बने ‘कुरुत’ के बोरे रखे रहते हैं। उसका दायाँ पैर लकड़ी की तरह कठोर हो चुका है। वह चिड़चिड़ा, क्रोधी और शराब का आदी है। जो ग्राहक उसके माल को महँगा कहता है, उससे वह लड़ने लगता है और बार-बार दावा करता है कि वह कानून को दूसरों से अधिक जानता है तथा लोगों के लिए उसने खून बहाया है।

धीरे-धीरे ज्ञात होता है कि यह व्यक्ति कभी ‘दलावोय’ नामक कर-संग्रहकर्ता था। उसके पास सरकारी पद, घोड़ा, चाबुक और चमड़े का थैला था। लोग उसका सम्मान नहीं करते थे, बल्कि उससे डरते थे। युद्ध के बाद की गरीबी में भी वह कर न चुका पाने वाले लोगों के घरों से उनकी आवश्यक वस्तुएँ उठा ले जाता था।

एक दिन वह कथावाचक के घर पहुँचता है। परिवार कर चुकाने में असमर्थ है। दलावोय उनकी एकमात्र बकरी छीनने लगता है, जिसके दूध पर बच्चों का पालन निर्भर है। माँ बार-बार विनती करती है, लेकिन वह कानून का भय दिखाता रहता है। वह घोड़े को बेरहमी से पीटता है, माँ को अपमानित करता है और बच्चों को ‘टेढ़े-मेढ़े’ कहकर कोसता है। इससे आहत माँ उसे संतानहीन रहने की बद्दुआ दे देती है।

दलावोय बकरी लेकर चला जाता है। पिता क्रोध में बंदूक उठा लेते हैं, पर माँ उन्हें रोकती है। पिता स्पष्ट करते हैं कि सरकार ने किसी गरीब परिवार की आखिरी संपत्ति छीनने का आदेश नहीं दिया; दलावोय अपने स्वार्थ और क्रूरता से सरकार को बदनाम कर रहा है।

आगे चलकर दलावोय अपनी पत्नी को संतान न होने के कारण पीटता और अपमानित करता है। उसकी पहली पत्नी उसे छोड़कर दूसरा विवाह करती है और संतान प्राप्त करती है। दूसरी पत्नी भी संतानहीन रहती है, लेकिन वह दलावोय के अत्याचार की शिकायत कर देती है। फलतः दलावोय की नौकरी चली जाती है। बाद में नशे की अवस्था में घोड़े से गिरकर उसके पैर और कमर टूट जाते हैं। वही शक्तिशाली कर-संग्रहकर्ता अंततः बाज़ार में बैठकर पिस्ते बेचने को विवश हो जाता है।

सत्ता के अहंकार का चित्रण

कहानी का केंद्रीय विषय सत्ता का अमानवीय दुरुपयोग है। दलावोय स्वयं को कानून का प्रतिनिधि मानता है, लेकिन व्यवहार में वह कानून को निजी हिंसा और लूट का साधन बना देता है। उसके लिए सरकारी कागज़ न्याय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भय उत्पन्न करने वाला हथियार है।

उसका बार-बार यह कहना कि वह “कानून” जानता है, कहानी में तीखा व्यंग्य उत्पन्न करता है। वास्तव में वह कानून की आत्मा—न्याय, करुणा और लोकहित—से पूरी तरह अनभिज्ञ है। वह केवल कानून की बाहरी शक्ति जानता है। इसी कारण उसका चरित्र उस नौकरशाही का प्रतीक बन जाता है, जिसमें पदाधिकारी नियमों का उपयोग निर्बलों की रक्षा के बजाय उनके शोषण के लिए करते हैं।

कथावाचक के पिता का कथन इस कहानी की वैचारिक धुरी है—सरकार ने किसी गरीब के घर से उसकी अंतिम संपत्ति छीन लेने को नहीं कहा। इससे लेखक व्यवस्था और उसके भ्रष्ट प्रतिनिधि के बीच अंतर करता है। कहानी केवल राज्य-विरोधी आख्यान नहीं बनती; वह बताती है कि व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता तब होती है, जब उसका प्रतिनिधि अपने निजी स्वार्थ को कानून का नाम देने लगता है।

दलावोय का चरित्र

दलावोय कहानी का सबसे जटिल पात्र है। वह केवल खलनायक नहीं, बल्कि सत्ता, हिंसा, असुरक्षा और आत्मभ्रम से निर्मित व्यक्ति है। उसके व्यक्तित्व के कई स्तर हैं—

पहले वह कर-संग्रहकर्ता है, जिसके पास घोड़ा, चाबुक और सरकारी थैला है। इन वस्तुओं से उसकी शक्ति निर्मित होती है। लोग उसे इसलिए सलाम करते हैं क्योंकि वे उससे भयभीत हैं। उसके व्यक्तित्व में वास्तविक प्रतिष्ठा नहीं, केवल आतंक है।

दूसरे स्तर पर वह क्रूर पुरुष है। वह गरीब परिवार की बकरी छीनता है, पशु पर चाबुक चलाता है, स्त्री को अपमानित करता है और अपने ही वैवाहिक जीवन में पत्नी पर हिंसा करता है। उसकी प्रशासनिक क्रूरता और पारिवारिक हिंसा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। जो व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में निर्बलों पर अत्याचार करता है, वही निजी जीवन में स्त्री को भी अधिकारहीन समझता है।

तीसरे स्तर पर वह असफल और टूटा हुआ मनुष्य है। सत्ता चली जाने के बाद भी उसका अहंकार समाप्त नहीं होता। पिस्ता बेचते हुए भी वह पुराने पद और ‘कानून’ की भाषा में बोलता है। उसका कठोर पैर केवल शारीरिक विकलांगता का संकेत नहीं, बल्कि उसके जड़ हो चुके व्यक्तित्व का भी प्रतीक है। समय बदल गया, परिस्थितियाँ बदल गईं, लेकिन उसका मन नहीं बदला।

माँ का चरित्र

कहानी में माँ करुणा, मातृत्व और नैतिक शक्ति की प्रतिनिधि है। वह आर्थिक रूप से असहाय है, लेकिन मानवीय दृष्टि से दलावोय से कहीं अधिक शक्तिशाली है। आरम्भ में वह विनम्रता से उसका स्वागत करती है, भोजन का निमंत्रण देती है और कर चुकाने के लिए कुछ समय माँगती है। उसकी विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक शिष्टता और मानवीयता है।

जब दलावोय बच्चों को अपमानित करता है, तब वही विनम्र माँ प्रतिरोध की मूर्ति बन जाती है। उसके लिए बकरी की हानि सहन की जा सकती है, लेकिन बच्चों का अपमान नहीं। उसकी बद्दुआ आर्थिक क्षति से नहीं, मातृत्व पर हुए आघात से निकलती है।

माँ के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी क्षमाशीलता है। दलावोय की पत्नी जब रोती हुई उसके पास आती है, तो माँ उसे सांत्वना देती है और अपनी बद्दुआ वापस लेने की बात कहती है। वह अपने अत्याचारी की पत्नी को शत्रु नहीं मानती। यहाँ माँ प्रतिशोध से ऊपर उठकर स्त्री-सहानुभूति और मानवीय करुणा का परिचय देती है।

स्त्री-जीवन और पितृसत्ता

कहानी का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्त्री की सामाजिक स्थिति है। दलावोय की पत्नी को संतान न होने के कारण ‘बाँझ गाय’ कहा जाता है और पीटा जाता है। पुरुष अपनी संतानहीनता की सम्भावना पर विचार नहीं करता; सारा दोष स्त्री पर डाल देता है।

इस प्रकार लेखक ने पितृसत्तात्मक समाज की उस मानसिकता की आलोचना की है, जिसमें स्त्री की पहचान उसके मातृत्व से निर्धारित होती है। संतान न होने पर उसे अपमान, हिंसा और सामाजिक उपहास सहना पड़ता है। दलावोय का अपनी पत्नी के प्रति व्यवहार यह प्रमाणित करता है कि सत्ता का अहंकार केवल सरकारी पद तक सीमित नहीं रहता; वह परिवार के भीतर पुरुष-वर्चस्व का रूप भी ग्रहण कर लेता है।

इसके विपरीत, कथावाचक की माँ और दलावोय की पत्नी के बीच निर्मित आत्मीयता स्त्री-संघर्ष की मानवीय अभिव्यक्ति है। एक स्त्री दूसरी स्त्री की पीड़ा को समझती है, भले ही वह उसके अत्याचारी की पत्नी हो।

कर्मफल और समय का न्याय

कहानी की संरचना कर्मफल की पारंपरिक अवधारणा पर आधारित दिखाई देती है। दलावोय ने घोड़े को चाबुक से पीटा था; बाद में वही घोड़ा उसे घसीटते हुए घायल कर देता है। उसने गरीबों की संपत्ति छीनी थी; अंत में स्वयं फुटपाथ पर मामूली वस्तुएँ बेचने को विवश होता है। उसने स्त्रियों को संतानहीनता के लिए अपमानित किया; स्वयं जीवनभर संतान से वंचित रहता है।

किन्तु कहानी का महत्व केवल इस सूत्र में नहीं है कि बुरे कर्मों का बुरा फल मिलता है। लेखक इस न्याय को सरल प्रतिशोध के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। कहानी के अंत में कथावाचक को दलावोय पर दया भी आती है। इस प्रकार पाठक को केवल संतोष नहीं मिलता कि अत्याचारी दंडित हो गया; उसके सामने एक कठिन नैतिक प्रश्न भी उपस्थित होता है—क्या पतन के बाद अत्याचारी भी हमारी करुणा का अधिकारी हो सकता है?

स्मृति का मनोविज्ञान

पूरी कहानी वर्तमान से अतीत की ओर जाती है और फिर वर्तमान में लौटती है। वृद्ध पिस्ता-विक्रेता को देखकर कथावाचक के भीतर बचपन की स्मृतियाँ जागती हैं। यह स्मृति केवल घटना का पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि पुराने घाव का पुनर्जीवन है।

कथावाचक स्वीकार करता है कि उसे दलावोय पर दया आती है। वह यह भी सोचता है कि सम्भवतः दलावोय अपना काम कर रहा था और परिस्थितियाँ कठिन थीं। लेकिन तर्क और सहानुभूति के बावजूद वह अपनी माँ की आँसुओं से भरी आँखें नहीं भूल पाता।

यहीं कहानी मनोवैज्ञानिक गहराई प्राप्त करती है। बचपन में देखा गया अन्याय मनुष्य की चेतना में स्थायी रूप से अंकित हो जाता है। समय अत्याचारी की स्थिति बदल सकता है, लेकिन पीड़ित की स्मृति से अपमान को पूरी तरह मिटा नहीं सकता।

शीर्षक की सार्थकता

‘पिस्ता वाला’ शीर्षक अत्यंत सरल, किन्तु गहरे व्यंग्य से भरा हुआ है। कहानी का नायक कभी आतंक उत्पन्न करने वाला कर-संग्रहकर्ता था। उसकी पहचान सरकारी पद, घोड़े, चाबुक और कानून से थी। अब उसकी पहचान केवल पिस्ता बेचने वाले व्यक्ति की है।

यह शीर्षक मनुष्य की सामाजिक हैसियत की अस्थिरता को रेखांकित करता है। पद और शक्ति स्थायी नहीं हैं। समय शक्तिशाली व्यक्ति की पूरी पहचान बदल सकता है। ‘दलावोय’ का ‘पिस्ता वाला’ बन जाना केवल आर्थिक पतन नहीं, सत्ता के मिथ्या अभिमान का विघटन है।

पिस्ते का छोटा-सा गिलास भी प्रतीकात्मक अर्थ ग्रहण करता है। कभी वह लोगों के घरों से गलीचे, समावर और पशु उठा लेता था; अब स्वयं मुट्ठी भर पिस्ते नापकर बेचता है। जिसने दूसरों की संपत्ति पर निर्ममता से अधिकार किया था, वह अब प्रत्येक छोटे सिक्के पर निर्भर है।

कहानी का शिल्प

कहानी की रचना पूर्वदीप्ति शैली में हुई है। आरम्भ और अंत वर्तमान में हैं, जबकि मध्य भाग अतीत की घटना को विस्तार से प्रस्तुत करता है। इससे कथानक वृत्ताकार संरचना ग्रहण करता है।

लेखक ने दृश्यात्मक वर्णन का प्रभावशाली उपयोग किया है। बाज़ार का प्रवेश-द्वार, पिस्ते के बोरे, अंगारों वाली बाल्टी, सलेटी आँखें, पीली मूँछें, लाल-भूरा घोड़ा, साँप जैसा चाबुक, रोती हुई माँ और बकरी से चिपके मेमने—ये सभी चित्र कहानी को जीवंत बनाते हैं।

संवाद पात्रों की मानसिकता खोलते हैं। दलावोय के संवाद अहंकारपूर्ण और आदेशात्मक हैं; माँ की भाषा आरम्भ में विनम्र, फिर प्रतिरोधपूर्ण और अंततः करुणामयी है। पिता की भाषा व्यवस्था और उसके भ्रष्ट प्रतिनिधि के बीच अंतर स्पष्ट करती है।

कहानी में विडम्बना भी अत्यंत प्रभावी है। जो व्यक्ति बार-बार कानून जानने का दावा करता है, उसका जीवन स्वयं अन्याय और अव्यवस्था का उदाहरण है। जो घोड़े पर बैठकर लोगों को डराता था, उसी घोड़े से गिरकर अपाहिज हो जाता है। जो बच्चों को कोसता है, वही संतान के लिए तरसता है।

भाषा और अनुवाद

कहानी की भाषा लोकजीवन से जुड़ी हुई है। ‘कुरुत’, ‘तियिन’ और ‘गोजा’ जैसे उज़्बेक सांस्कृतिक शब्द कथा को स्थानीयता प्रदान करते हैं। इनके स्पष्टीकरण से हिंदी पाठक उज़्बेक खान-पान और सामाजिक जीवन से परिचित होता है।

हिंदी अनुवाद में मूल कथा की संवेदना, लोक-परिवेश और संवादधर्मिता सुरक्षित दिखाई देती है। फिर भी कुछ स्थानों पर वाक्य-विन्यास अस्वाभाविक और व्याकरणिक रूप से असंपादित प्रतीत होता है। उदाहरणतः लिंग, वचन और क्रिया-सामंजस्य की कुछ त्रुटियाँ पाठकीय प्रवाह को बाधित करती हैं। भावी संस्करण में सूक्ष्म भाषिक संपादन से कहानी की प्रभावशीलता और बढ़ सकती है।

आलोचनात्मक निष्कर्ष

‘पिस्ता वाला’ सत्ता और उसके पतन की कहानी होते हुए भी केवल दंड और प्रतिशोध का आख्यान नहीं है। यह बताती है कि अन्याय करने वाला मनुष्य भी अंततः परिस्थितियों का असहाय पात्र बन सकता है; फिर भी उसके प्रति उत्पन्न करुणा पीड़ित की स्मृति को समाप्त नहीं कर सकती।

कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका नैतिक द्वंद्व है। पाठक दलावोय के पतन को देखकर न्याय की अनुभूति करता है, किंतु उसकी अपाहिज और दयनीय अवस्था देखकर पूरी तरह प्रसन्न भी नहीं हो पाता। वह घृणा और दया, न्याय और क्षमा, अतीत और वर्तमान के बीच खड़ा रह जाता है।

इस प्रकार ‘पिस्ता वाला’ मनुष्य को यह चेतावनी देती है कि पद, कानून और शक्ति क्षणभंगुर हैं, लेकिन शक्ति के मद में किए गए अपमान लोगों की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहते हैं। अंततः मनुष्य की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि इस बात से निर्धारित होती है कि उसने निर्बल और असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया।

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