प्रेम, स्मृति और समकालीन जीवन का आत्मीय काव्य-वृत्त डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ का आलोचनात्मक अध्ययन
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ की एक गंभीर साहित्यिक समीक्षा प्रस्तावना समकालीन हिंदी कविता का परिदृश्य अत्यंत विस्तृत और बहुवर्णी है। एक ओर राजनीतिक प्रतिरोध, अस्मितामूलक विमर्श, स्त्रीवाद, दलित चेतना, आदिवासी जीवन, विस्थापन, पर्यावरण और वैश्वीकरण जैसे व्यापक प्रश्न उसकी केंद्रीय चिंताओं में शामिल हुए हैं, तो दूसरी ओर मनुष्य के निजी संसार—प्रेम, स्मृति, अकेलापन, संबंध, संवादहीनता, प्रतीक्षा और आत्मसंघर्ष—ने भी कविता में नए अर्थ अर्जित किए हैं। आज का कवि केवल किसी बड़ी सामाजिक विचारधारा का प्रतिनिधि नहीं रह गया है; वह अपने छोटे-छोटे अनुभवों, व्यक्तिगत असुरक्षाओं, दैनंदिन वस्तुओं और मामूली दिखाई देने वाले क्षणों के माध्यम से भी अपने समय को पकड़ने का प्रयास करता है। डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ इसी दूसरी प्रवृत्ति से अपना प्रमुख संबंध बनाता हुआ दिखाई देता है, यद्यपि उसके भीतर सामाजिक और सार्वजनिक जीवन के अनेक प्रसंग भी मौजूद हैं। संग्रह की अनुक्रमणिका में लगभग साठ कविताएँ संगृहीत हैं और उनके शीर्षकों पर ही दृष्टि डालने स...