डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ की एक गंभीर साहित्यिक समीक्षा
प्रस्तावना
समकालीन हिंदी कविता का परिदृश्य अत्यंत विस्तृत और बहुवर्णी है। एक ओर राजनीतिक प्रतिरोध, अस्मितामूलक विमर्श, स्त्रीवाद, दलित चेतना, आदिवासी जीवन, विस्थापन, पर्यावरण और वैश्वीकरण जैसे व्यापक प्रश्न उसकी केंद्रीय चिंताओं में शामिल हुए हैं, तो दूसरी ओर मनुष्य के निजी संसार—प्रेम, स्मृति, अकेलापन, संबंध, संवादहीनता, प्रतीक्षा और आत्मसंघर्ष—ने भी कविता में नए अर्थ अर्जित किए हैं। आज का कवि केवल किसी बड़ी सामाजिक विचारधारा का प्रतिनिधि नहीं रह गया है; वह अपने छोटे-छोटे अनुभवों, व्यक्तिगत असुरक्षाओं, दैनंदिन वस्तुओं और मामूली दिखाई देने वाले क्षणों के माध्यम से भी अपने समय को पकड़ने का प्रयास करता है।
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ इसी दूसरी प्रवृत्ति से अपना प्रमुख संबंध बनाता हुआ दिखाई देता है, यद्यपि उसके भीतर सामाजिक और सार्वजनिक जीवन के अनेक प्रसंग भी मौजूद हैं। संग्रह की अनुक्रमणिका में लगभग साठ कविताएँ संगृहीत हैं और उनके शीर्षकों पर ही दृष्टि डालने से प्रेम, स्मृति, संबंध, वस्तु-जगत, स्थान, परिवार तथा सामाजिक अनुभव का विस्तृत संसार सामने आता है। ‘कविताओं के शब्द’, ‘तस्वीर खींचना’, ‘तुम जो सुलझाती हो’, ‘दुबली, पतली और उजली सी’, ‘तृषिता’, ‘सवालों से बंधी’, ‘मौन प्रार्थना के साथ’, ‘प्यार के किस्सों में’, ‘बनारस के घाट’, ‘लंकैरिंग’, ‘अयोध्या’, ‘यह पीला स्वेटर’, ‘माँ! तो वो तुम ही थी’, ‘औरत’, ‘लड्डू’, ‘जीवन राग’, ‘पहली बारिश’ और शीर्षक कविता ‘इस बार तुम्हारे शहर में’—ये नाम ही संग्रह की विषयगत विविधता का संकेत देते हैं।
फिर भी इस संग्रह की केंद्रीय भावभूमि निर्विवाद रूप से प्रेम है। लेकिन यह प्रेम किसी एक भाव-मुद्रा में स्थिर नहीं रहता। उसमें मिलन है, विरह है, स्मृति है, प्रतीक्षा है, प्रश्न हैं, आश्वासन है, अधिकार है, असुरक्षा है, ईर्ष्या है, संवाद है, गलतफहमी है और सबसे बढ़कर संबंध को बचाए रखने की तीव्र इच्छा है। इस अर्थ में यह संग्रह किसी आदर्शीकृत प्रेम का काव्य नहीं, बल्कि संबंध की जीवित प्रक्रिया का काव्य है।
इस संग्रह की समीक्षा करते हुए एक बात स्पष्ट रूप से कहनी आवश्यक है कि इसकी शक्ति और इसकी सीमा कई बार एक ही स्रोत से उत्पन्न होती है—कवि की अत्यधिक भावनात्मक ईमानदारी। जहाँ यह ईमानदारी अनुभव को सहज और विश्वसनीय बनाती है, वहीं कुछ कविताओं में यही सहजता पर्याप्त कलात्मक रूपांतरण के अभाव में सपाट कथन में भी बदल जाती है। इसलिए संग्रह का उचित मूल्यांकन न तो केवल उसकी प्रशंसा करके संभव है, न केवल उसकी कमजोरियों को रेखांकित करके। इसे उस कवि की रचनात्मक यात्रा के रूप में पढ़ना अधिक उचित होगा जो अपने अनुभव को जटिल बौद्धिक आडंबर से बचाते हुए सीधे कविता में रूपांतरित करना चाहता है।
1. कविता के सामाजिक दायित्व की घोषणा
संग्रह की पहली कविता ‘कविताओं के शब्द’ वस्तुतः कवि की काव्य-दृष्टि का घोषणापत्र है। कवि यहाँ चाहता है कि उसके शब्द केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों की अभिव्यक्ति न रहें, बल्कि अन्याय के विरुद्ध उपस्थित हों। वह संवेदनाओं के अभाव में, मुट्ठियों के तन जाने में, समाज के खिलाफ तैयार होते औजारों में और ‘किसी बिटिया की आँखों का नूर’ बनने की आकांक्षा में अपने शब्दों की उपस्थिति चाहता है। कविता का अंतिम भाव आशा को बचाए रखने से जुड़ता है।
यह कविता महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके बाद आने वाली अधिकांश कविताएँ निजी प्रेम और व्यक्तिगत संबंधों पर केंद्रित हैं। पहली कविता मानो यह स्पष्ट कर देना चाहती है कि कवि का निजी संसार सामाजिक संसार से पूरी तरह कटा हुआ नहीं है। उसके लिए कविता का अर्थ केवल आत्म-अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना भी है।
यहाँ कवि की भाषा घोषणात्मक है। वह कविता से प्रतिरोध की अपेक्षा करता है। लेकिन गंभीर आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह भी कहा जा सकता है कि संग्रह की आगामी कविताओं में यह सामाजिक प्रतिरोध उतनी व्यापकता से विकसित नहीं होता जितना पहली कविता में उसका संकेत मिलता है। सामाजिक चेतना उपस्थित है, किंतु संग्रह की मुख्य ऊर्जा अंततः प्रेम, स्मृति और संबंधों के निजी संसार में प्रवाहित होती है।
इसे संग्रह की कमजोरी मानना आवश्यक नहीं है। हर कवि का अपना केंद्रीय अनुभव-क्षेत्र होता है। समस्या केवल तब उत्पन्न होती है जब प्रारंभिक घोषणा और आगे की रचनात्मक दिशा में बड़ा अंतर दिखाई देता है। यहाँ अंतर है, किंतु पूर्ण विच्छेद नहीं। ‘दुबली, पतली और उजली सी’, ‘मैंने कुछ गालियाँ सीखी हैं’, ‘पेन’, ‘जूते’, ‘बनारस के घाट’, ‘लंकैरिंग’, ‘औरत’, ‘लड्डू’ जैसी कविताएँ कवि की सामाजिक दृष्टि के दूसरे रूप प्रस्तुत करती हैं।
2. ‘तस्वीर खींचना’: आत्म-साक्षात्कार का रूपक
संग्रह की आरंभिक कविताओं में ‘तस्वीर खींचना’ छोटी होने के बावजूद अत्यंत अर्थपूर्ण कविता है। तस्वीर खींचना यहाँ केवल फोटोग्राफी नहीं है। कवि इसे स्वयं को उन हिस्सों में देखने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत करता है जिन्हें हम जानना चाहते हैं किंतु देख नहीं पाते। कविता में लेंस और जीवन के ‘व्याकरण’ का संबंध स्थापित होता है।
यह रूपक संग्रह की पूरी काव्य-प्रक्रिया को समझने में सहायक है। वास्तव में इस संग्रह की अधिकांश कविताएँ कवि द्वारा अपने ही भावनात्मक जीवन की तस्वीरें खींचने जैसी हैं। वह कभी प्रेमिका को देखता है, कभी स्वयं को उसके संदर्भ में देखता है, कभी संबंध की दरारों को, कभी अनुपस्थिति को, कभी स्मृति को और कभी दैनिक जीवन की साधारण वस्तुओं को।
कवि का कैमरा बाहर की दुनिया को जितना पकड़ता है, उससे अधिक भीतर की दुनिया को पकड़ना चाहता है।
यहीं संग्रह का एक मूल गुण सामने आता है—आत्मस्वीकार। कवि अपनी असुरक्षा को छिपाता नहीं। वह प्रेम में स्वयं को सर्वशक्तिमान या सर्वज्ञ नहीं दिखाता। वह बार-बार स्वीकार करता है कि वह नहीं जानता, समझ नहीं पाता, डरता है, प्रतीक्षा करता है, प्रश्न पूछता है और उत्तर चाहता है।
समकालीन प्रेम-कविता में यह असुरक्षित पुरुष-संवेदना उल्लेखनीय है, क्योंकि पारंपरिक प्रेम-काव्य में पुरुष प्रायः प्रेम का कर्ता होता है और स्त्री प्रेम का विषय। यहाँ अनेक स्थानों पर पुरुष स्वयं प्रश्नाकुल, निर्भर और भावनात्मक रूप से असुरक्षित दिखाई देता है।
3. ‘तुम’: एक व्यक्ति से अधिक एक काव्यात्मक उपस्थिति
इस संग्रह का सबसे अधिक प्रयुक्त और सबसे महत्वपूर्ण शब्द संभवतः ‘तुम’ है।
यह ‘तुम’ कौन है?
संग्रह इसकी निश्चित पहचान नहीं देता। यही इसकी काव्यात्मक शक्ति भी है। यह प्रेमिका है, साथी है, स्मृति है, प्रतीक्षा है, कभी प्रेरणा है और कभी ऐसी अनुपस्थिति जो उपस्थित व्यक्ति से भी अधिक शक्तिशाली है।
‘तुम जो सुलझाती हो’ में प्रिय स्त्री का चरित्र विरोधाभासों से निर्मित होता है—वह धूप-सी सुनहरी भी है, बर्फ-सी ठंडी भी; वर्षा की बूंदों जैसी भी और जलती जिंदगी जैसी भी। कविता का निष्कर्ष यह है कि ‘तुम औरत हो’ और मनुष्य के लिए उस अस्तित्व को पूरी तरह समझ लेना संभव नहीं।
इस कविता में स्त्री को रहस्यमय बनाने की पारंपरिक काव्य-प्रवृत्ति दिखाई देती है। यह काव्यात्मक रूप से आकर्षक है, किंतु आलोचनात्मक रूप से एक प्रश्न भी उठाती है: क्या स्त्री की जटिलता को ‘औरत को समझना असंभव है’ जैसे निष्कर्ष में बदल देना उसके वास्तविक व्यक्तित्व को रहस्य में सीमित नहीं कर देता?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संग्रह की अन्य कविताओं में स्त्री अधिक मानवीय और वास्तविक दिखाई देती है—वह नाराज़ होती है, प्रश्न पूछती है, मोबाइल देखती है, चाय बनाती है, रिश्ते को लेकर असुरक्षित होती है, अपने निर्णय लेती है और कवि से असहमति भी रखती है।
इस अर्थ में संग्रह की सबसे रोचक बात यह है कि उसका ‘तुम’ पूरी तरह आदर्शीकृत नहीं है।
वह देवी नहीं है।
वह जीवित मनुष्य है।
उसके साथ प्रेम करना जितना सुंदर है, उतना ही कठिन भी।
4. प्रेम का वास्तविक भूगोल: आकर्षण से अधिक संबंध
संग्रह की प्रेम-कविताओं को मोटे तौर पर तीन स्तरों पर पढ़ा जा सकता है।
पहला स्तर है—आकर्षण और सौंदर्य का।
दूसरा—संबंध और संवाद का।
तीसरा—अनुपस्थिति और स्मृति का।
इस संग्रह की विशेषता यह है कि दूसरा और तीसरा स्तर पहले से कहीं अधिक प्रभावी हैं।
उदाहरण के लिए ‘तृषिता’ में प्रेम दो व्यक्तियों के बीच मानने और न मानने की मनोवैज्ञानिक स्थिति के रूप में आता है। कविता में एक व्यक्ति कहता है कि “तुम जब भी रूठती हो मैं मना ही लेता हूँ,” जबकि दूसरा पक्ष यह संकेत देता है कि वह मानना चाहती है, तभी मानती है। प्रेम में मनाना यहाँ विजय नहीं, संबंध का खेल है।
‘तुम्हें मनाने के’ तो इस पूरे मनोविज्ञान को एक सूत्र में व्यक्त करती है—किसी को जानना और उसे मनाने का व्याकरण जानना अलग बातें हैं।
यह छोटी कविता संग्रह की अधिक सफल लघु कविताओं में रखी जा सकती है। इसमें न्यूनतम शब्दों में संबंध का एक बड़ा सत्य व्यक्त होता है।
प्रेम में व्यक्ति को जानना पर्याप्त नहीं।
उसकी चुप्पी समझनी होती है।
उसकी नाराज़गी की भाषा जाननी होती है।
उसके लौटने के रास्ते पहचानने होते हैं।
यहीं कवि की प्रेम-दृष्टि रूमानी होकर भी अनुभवजन्य हो जाती है।
5. प्रेम में प्रश्नों की केंद्रीयता
इस संग्रह का प्रेम विश्वास से जितना निर्मित है, उतना ही प्रश्नों से भी।
‘सवालों से बंधी’ में प्रश्न केवल सूचना पाने का माध्यम नहीं हैं। वे दो व्यक्तियों के बीच भावनात्मक संवाद की प्रक्रिया हैं। ‘न जाने कितनी बार’ में कवि प्रिय की सोचती आँखों और मौन को पढ़ने की कोशिश करता है। ‘कही-अनकही’ में कहा और अनकहा दोनों संबंध का हिस्सा बनते हैं।
और संग्रह के उत्तरार्ध में ‘तुम जितना झुठलाती हो’ में प्रश्न सीधे विश्वास की परीक्षा लेते हैं। कवि स्वीकार करता है कि कुछ प्रश्नों के उत्तर उसे आवश्यक हैं, क्योंकि प्रेम में केवल भावनाएँ पर्याप्त नहीं; विश्वास को टिकाने के लिए कुछ उत्तर भी आवश्यक होते हैं।
यहाँ प्रेम की एक गंभीर मनोवैज्ञानिक समझ सामने आती है।
अक्सर रोमानी कविता प्रेम को प्रश्नरहित समर्पण के रूप में प्रस्तुत करती है।
यह संग्रह ऐसा नहीं करता।
यह स्वीकार करता है कि संबंध में प्रश्न होते हैं।
संदेह होते हैं।
स्पष्टीकरण आवश्यक होते हैं।
मौन हमेशा सुंदर नहीं होता।
और विश्वास बिना संवाद के स्थायी नहीं रह सकता।
यही कारण है कि संग्रह की अनेक कविताएँ वस्तुतः प्रेम-कविताएँ कम और संवाद-कविताएँ अधिक हैं।
6. ‘दुबली, पतली और उजली सी’: संग्रह की उल्लेखनीय सामाजिक कविता
संग्रह की आरंभिक कविताओं में ‘दुबली, पतली और उजली सी’ अपनी विषयवस्तु और वातावरण के कारण अलग दिखाई देती है।
कविता की लड़की “जहाँ रहती / वहीं खोयी रहती / और होकर भी / न होती” है। कवि उसकी चुप्पी के भीतर किसी अज्ञात महाकाव्य को महसूस करता है। उसका जीवन किसी बंद खिड़की की तरह है। वह बाहर निकलना चाहती है, किंतु उसकी चुप्पी उसके भीतर की जटिलताओं को छिपाए हुए है।
यह कविता संग्रह की प्रेम-केंद्रित संवेदना से बाहर निकलकर स्त्री के मौन को पढ़ती है।
इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि कवि उसके जीवन का कोई कृत्रिम समाधान प्रस्तुत नहीं करता।
वह केवल यह कहता है कि शायद किसी जिंदगी में “कोई खिड़की खुली रहना बहुत जरूरी है।”
यह खिड़की स्वतंत्रता की हो सकती है।
संवाद की।
प्रेम की।
स्वयं होने की।
या केवल साँस लेने की।
कविता का यह बिंब संग्रह की अधिक परिपक्व काव्यात्मक उपलब्धियों में है।
यदि कवि ऐसी कविताओं की संख्या बढ़ाता, तो संग्रह का सामाजिक और मानवीय क्षितिज और व्यापक हो सकता था।
7. प्रेम और मौन
संग्रह में प्रेम का एक लगातार लौटने वाला तत्व है—मौन।
लेकिन मौन के अर्थ बदलते रहते हैं।
कभी मौन नाराज़गी है।
कभी अनकहा प्रेम।
कभी प्रश्न।
कभी दूरी।
कभी ऐसा संवाद जिसे शब्दों की आवश्यकता नहीं।
‘मौन प्रार्थना के साथ’ में सामाजिक औपचारिकताओं के बीच व्यक्ति अपने प्रिय को याद करता है। वह शुभकामनाएँ भेजता है, लेकिन उसे लगता है कि औपचारिकता से परे उसका वास्तविक भाव मौन प्रार्थना में है।
‘प्यार के किस्सों में’ कविता प्रेम को टूटकर अनेक हिस्सों में फैल जाने वाली चीज के रूप में देखती है—आँख के आँसू में, साँस की खुशबू में, स्मृति में और दूसरे व्यक्ति के उदास चेहरे पर। कविता का मूल विचार है कि प्रेम समाप्त नहीं होता; वह अपने रूप बदलता है।
यह संग्रह की प्रमुख काव्य-दृष्टि भी है।
यहाँ प्रेम का अंत बहुत कम होता है।
दूरी होती है, लेकिन प्रेम बचा रहता है।
नाराज़गी होती है, लेकिन संबंध बचा रहता है।
अनुपस्थिति होती है, लेकिन स्मृति बची रहती है।
यही भाव आगे शीर्षक कविता तक जाता है।
8. ‘सिर्फ होने से बात नहीं होती’: संग्रह का केंद्रीय प्रेम-दर्शन
संग्रह की महत्वपूर्ण कविताओं में ‘सिर्फ होने से बात नहीं होती’ विशेष उल्लेख की अधिकारी है।
कविता कहती है कि केवल किसी का जीवन में होना पर्याप्त नहीं। संबंध के लिए सपने, सहभागिता, स्मृति, साथ और साझा अनुभव आवश्यक हैं। दो व्यक्तियों की बातचीत कम भी हो सकती है, लेकिन यदि उनके बीच साझा भावभूमि है, तो संबंध बचा रह सकता है।
यह कविता शीर्षक से ही एक दार्शनिक कथन प्रस्तुत करती है।
‘होना’ और ‘साथ होना’ अलग बातें हैं।
‘उपस्थिति’ और ‘सहभागिता’ अलग हैं।
‘संबंध’ और ‘संबंध का जीवन’ अलग हैं।
इस कविता में कवि की भाषा अपेक्षाकृत संयमित है और विचार सीधे भाव में परिवर्तित होता है। संग्रह में जहाँ भी कवि छोटे कथन से बड़े अनुभव को पकड़ता है, वहाँ उसकी कविता अधिक प्रभावी हो जाती है।
9. प्रेम में देह की अपेक्षा आत्मीयता
इस संग्रह में प्रेम की शारीरिकता लगभग अनुपस्थित नहीं, लेकिन अत्यंत संयमित है। कवि देह को संकेतों, खुशबू, स्पर्श, आँख, साँस, बाल, मुस्कान और निकटता के माध्यम से व्यक्त करता है।
‘उसे जब देखता हूँ’ में प्रिय को देखकर कवि अपनी आत्मा का विस्तार महसूस करता है। वह सौंदर्य की कोई स्थिर परिभाषा नहीं देता; बल्कि कहता है कि प्रिय के बिना सौंदर्य की परिभाषा अधूरी है।
यहाँ प्रेम शारीरिक आकर्षण से ऊपर उठकर अस्तित्व की पूर्णता से जुड़ता है।
फिर भी कुछ कविताओं में ‘तुम्हारी आँखें’, ‘तुम्हारी खुशबू’, ‘तुम्हारे बाल’, ‘तुम्हारी मुस्कान’ जैसे पारंपरिक प्रेम-बिंब बार-बार लौटते हैं। यह पुनरावृत्ति संग्रह की सीमा भी है।
प्रेम-काव्य का सबसे बड़ा संकट यही है कि प्रेम के अनुभव तो निजी होते हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने की भाषा सदियों से प्रयुक्त होती रही है।
इसलिए आधुनिक प्रेम-कवि के सामने चुनौती यह है कि वह पुराने भावों के लिए नई भाषा खोजे।
मनीष कुमार मिश्रा की कविताएँ जहाँ रोजमर्रा की वस्तुओं और विशिष्ट प्रसंगों का सहारा लेती हैं, वहाँ वे अधिक मौलिक दिखाई देती हैं; जहाँ वे केवल आँख, खुशबू, मुस्कान और स्मृति के पारंपरिक संयोजन में रहती हैं, वहाँ उनकी विशिष्टता कुछ कम हो जाती है।
10. वस्तुओं का भावात्मक संसार
संग्रह की उल्लेखनीय विशेषताओं में एक है साधारण वस्तुओं को कविता का विषय बनाना।
‘चाय का कप’ में एक कप प्रेम और स्मृति की ऊष्मा का माध्यम बन जाता है।
‘मोबाइल’ में तकनीक संबंध का हास्यपूर्ण उपकरण बनती है।
‘कैमरा’ बताता है कि तस्वीरें सहेजने वाला उपकरण हर अनुभव को बचा नहीं सकता।
‘पेन’ कवि की रचनात्मक बेचैनी का प्रतीक है।
‘नेलकटर’ रोजमर्रा की अनुपयोगी लगने वाली वस्तु के माध्यम से स्मृति और आवश्यकता के संबंध को व्यक्त करता है।
‘जूते’ में वस्तु जीवन की गति, संघर्ष और सामाजिक दृष्टि का प्रतीक बनती है।
इन कविताओं में कवि की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वह कविता के विषय को ‘महान’ बनाने की चिंता नहीं करता।
वह साधारण चीजों में कविता ढूँढ़ता है।
यह आधुनिक कविता का महत्वपूर्ण गुण है।
‘कैमरा’ की संक्षिप्तता विशेष रूप से प्रभावी है—मनुष्य स्मृतियों को तस्वीरों में कैद करने के लिए कैमरा खरीदता है, लेकिन भूल जाता है कि कैमरा यादों को कैद कर सकता है, उन्हें लौटा नहीं सकता। फिर प्रिय के दूर जाने पर कैमरा स्वयं बेकार हो जाता है।
यह कविता लगभग बिना अलंकारिक सजावट के एक गहरी बात कहती है।
यह संग्रह की सफल लघु कविताओं में गिनी जानी चाहिए।
11. भाषा, क्षेत्र और अस्मिता: ‘मैंने कुछ गालियाँ सीखी हैं’
‘मैंने कुछ गालियाँ सीखी हैं’ संग्रह की दिलचस्प सामाजिक कविताओं में है। यहाँ भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान और आत्मसम्मान का प्रश्न है।
कविता का कथ्य इस विचार से जुड़ता है कि जब व्यक्ति की अपनी भाषा और क्षेत्रीय पहचान का अपमान होता है तो वह प्रतिक्रिया करना सीखता है। कविता इस विडंबना को सामने लाती है कि ऐसे देश में जहाँ भाषा मनुष्यों को जोड़ सकती है, वही भाषा कभी-कभी पहचान के संघर्ष का माध्यम बन जाती है।
कविता की शक्ति उसके कथ्य में है, किंतु शिल्पगत रूप से यह कुछ अधिक व्याख्यात्मक है
कवि कई बार पाठक को स्वयं अर्थ ग्रहण करने का अवसर देने के बजाय निष्कर्ष सीधे बता देता है।
यह प्रवृत्ति पूरे संग्रह में दिखाई देती है।
जहाँ कविता संकेत में रुक जाती है, वहाँ वह अधिक प्रभावी होती है।
जहाँ वह अपने प्रतीक का अर्थ स्वयं समझाने लगती है, वहाँ उसका काव्यात्मक तनाव कुछ कम हो जाता है।
12. प्रेम और स्थान: पहाड़, शहर, बनारस
इस संग्रह में स्थान केवल पृष्ठभूमि नहीं हैं।
वे भावनात्मक भूगोल बनते हैं।
‘आजकल ये पहाड़ी रास्ते’ में पहाड़ स्मृति से भर जाते हैं। रास्तों का भूगोल प्रिय की याद का भूगोल बन जाता है।
‘हे देवभूमि!’ में हिमालयी प्रकृति का सौंदर्य अपेक्षाकृत पारंपरिक प्रकृति-काव्य की शैली में आता है—श्यामा, वसंता, कस्तूरिका, देवदार, आम, कैलाशी भूगोल, पर्वतीय सौंदर्य और देवभूमि के प्रति आकर्षण। कविता में प्राकृतिक चित्रण है, किंतु इसकी भाषा संग्रह की अन्य आत्मीय कविताओं की तुलना में अधिक वर्णनात्मक है।
सबसे महत्वपूर्ण स्थान-कविता निस्संदेह ‘बनारस के घाट’ है
यहाँ घाट केवल धार्मिक स्थल नहीं।
वे समता और जीवन-मृत्यु के अनुभव का स्थल हैं।
कवि कहता है कि घाट साधु-संत, बच्चे-बूढ़े सभी के हैं; वे प्रथम प्रणाम माँ गंगा को अर्पित करते हैं और अंतिम पड़ाव का सम्मान भी। इस तरह घाट जीवन के आरंभ और अंत दोनों के साक्षी हैं।
कविता में धार्मिकता है, लेकिन उससे बड़ा भाव सांस्कृतिक सहअस्तित्व का है।
‘बनारस के घाट’ को और अधिक दृश्यात्मक और बिंबात्मक बनाया जाता तो यह संग्रह की बहुत बड़ी कविता बन सकती थी। वर्तमान रूप में उसका विचार मजबूत है, किंतु उसके भीतर बनारस के दृश्य, ध्वनि, गंध और जीवन की बहुलता को अधिक विस्तार मिल सकता था।
13. ‘लंकैटिंग’: कविता और दस्तावेज के बीच
संग्रह की सबसे विशिष्ट कविताओं में ‘लंकैटिंग’ का उल्लेख आवश्यक है।
यह कविता बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के आसपास के लंका क्षेत्र की सामाजिक-सांस्कृतिक दुनिया का लगभग दस्तावेजी वर्णन करती है। विभिन्न दुकानों, स्थानों, भोजन, छात्र जीवन, अस्पताल, चौराहों, राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का उल्लेख इसे स्मृति-दस्तावेज बना देता है।
शुद्ध काव्यात्मक कसौटी से देखें तो इसमें सूचीकरण अधिक है और काव्यात्मक संघनन कम
लेकिन सांस्कृतिक स्मृति की दृष्टि से इसका महत्व है।
ऐसी कविताएँ किसी शहर के आधिकारिक इतिहास में दर्ज न होने वाले जीवन को बचाती हैं।
दुकानों के नाम बदल जाते हैं।
चाय की दुकानें बंद हो जाती हैं।
छात्र पीढ़ियाँ बदल जाती हैं।
लेकिन कविता उन्हें स्मृति में सुरक्षित कर सकती है।
इस अर्थ में ‘लंकैटिंग से अधिक सांस्कृतिक आर्काइव बन जाती है।
और यही उसकी विशिष्टता है।
14. प्रेम, स्मृति और अनुपस्थिति
संग्रह के दूसरे हिस्से में स्मृति की भूमिका और गहरी होती जाती है।
‘तुम्हारे जाने के बाद’ की कुछ पंक्तियाँ पूरे संग्रह की भावभूमि को संक्षेप में पकड़ती हैं—घर खाली नहीं होता, लेकिन प्रिय के जाने के बाद शाम, बेचैनी, आवारगी और इंतजार सब बदल जाते हैं।
इसी तरह ‘आज मेरे अंदर रुकी हुई एक नदी’ में वर्षों से भीतर रुकी नदी प्रिय के आने की आहट से बहने को तैयार है। नदी यहाँ दबे हुए प्रेम, स्मृति और भावनात्मक ऊर्जा का प्रभावी प्रतीक बनती है।
यह कविता संग्रह की अधिक काव्यात्मक रचनाओं में है।
नदी का रूपक स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
यहाँ कवि अनुभव को केवल बताता नहीं, उसका दृश्यात्मक रूप निर्मित करता है।
ऐसी कविताएँ यह संकेत देती हैं कि कवि की वास्तविक शक्ति बिंबात्मक कविता में भी है, यद्यपि संग्रह में वह अक्सर संवादात्मक सरलता को प्राथमिकता देता है।
15. ‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’: जीवन के अधूरेपन का रूपक
‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’ संग्रह की अवधारणात्मक दृष्टि से उल्लेखनीय कविताओं में है।
विद्यालयी प्रश्नपत्र में रिक्त स्थान भरना आसान है; जीवन में बने रिक्त स्थान भरना कठिन।
कविता इसी परिचित शैक्षिक क्रिया को अस्तित्वगत अनुभव में बदल देती है।
जीवन के रिक्त स्थानों में स्मृतियाँ रहती हैं।
मनुष्य उनमें लौटता है।
लेकिन समय के साथ रिक्तता बढ़ती जाती है।
यह रूपक सरल है, पर असरदार।
कवि यहाँ अपनी शिक्षक-संवेदना और जीवन-अनुभव को जोड़ता है। परिचित शैक्षिक शब्दावली अचानक भावात्मक अर्थ ग्रहण करती है।
इस कविता में एक महत्वपूर्ण आधुनिक अनुभव व्यक्त होता है—मनुष्य उम्र के साथ वस्तुओं से नहीं, खाली जगहों से अधिक घिरता जाता है।
छूटे लोग।
बीत चुके शहर।
टूटे संबंध।
अधूरे संवाद।
और स्मृतियाँ।
यह संग्रह का गहरा पक्ष है।
16. प्रेम में स्वत्व और समर्पण का द्वंद्व
संग्रह की प्रेम-दृष्टि एक दिलचस्प तनाव से निर्मित होती है।
एक ओर कवि पूर्ण समर्पण चाहता है।
दूसरी ओर वह अपने अस्तित्व की स्वतंत्रता भी बचाना चाहता है।
‘चुड़ैल’ कविता में प्रिय की आलोचना, उसकी नाराज़गी और आकर्षण के बीच एक चंचल संबंध दिखाई देता है।
‘उसने कहा’ में प्रिय कहती है कि कवि उसे स्वयं से अधिक चाहता है और सोचता है; कवि स्वीकार करता है कि उसकी उपस्थिति ने उसे बदल दिया है।
‘हे मेरी तुम’ में संबंधों की पेचीदगी, सामाजिक मान्यताओं और व्यक्तिगत आकांक्षा का तनाव मौजूद है।
यहाँ प्रेम पूरी तरह मुक्त नहीं।
उसके चारों ओर सामाजिक सीमाएँ हैं।
कवि उन सीमाओं को पहचानता है।
कई बार उससे बाहर निकलना चाहता है।
लेकिन उसके भीतर अपराधबोध, जिम्मेदारी और सामाजिक संरचना की चेतना भी बनी रहती है।
इसी कारण संग्रह की प्रेम-कविताएँ केवल उत्सवधर्मी नहीं हैं।
उनके भीतर एक लगातार बेचैनी है।
17. प्रेम का सबसे बड़ा गुण: सहजता
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की प्रेम-कविताओं का सबसे मजबूत पक्ष उनकी सहजता है।
वे कठिन शब्दावली से अपनी कविता को गंभीर सिद्ध करने का प्रयास नहीं करते।
वे प्रेम को दर्शन की भारी भाषा में नहीं लपेटते।
वे बोलचाल की स्थितियों से कविता बनाते हैं—
चाय का कप,
मोबाइल देखना,
नाराज़ होना,
संदेश का इंतजार,
किसी शहर में लौटना,
किसी स्वेटर की गर्मी,
किसी की गले में खराश,
एक कैमरा,
एक पेन,
एक विजिटिंग कार्ड,
एक खाली जगह।
यही साधारण वस्तुएँ कविता के भीतर आते ही संबंध की स्मृति बन जाती हैं।
यह संग्रह की वास्तविक पहचान है।
कवि का प्रेम महलों में नहीं रहता।
वह रोजमर्रा के जीवन में रहता है।
18. लेकिन सहजता और सपाटबयानी के बीच महीन रेखा
यहीं संग्रह की सबसे बड़ी आलोचनात्मक सीमा भी सामने आती है।
सहज होना और सपाट होना एक ही बात नहीं है।
सहज कविता सरल भाषा में भी अनेक अर्थ उत्पन्न करती है।
सपाट कविता वही कह देती है जो उसे संकेत में छोड़ना चाहिए था।
संग्रह की कई कविताओं में कवि भावनात्मक स्थिति को सुंदर ढंग से शुरू करता है, लेकिन फिर उसके अर्थ को स्वयं समझाने लगता है।
उदाहरणतः कुछ कविताओं में अंतिम पंक्तियाँ उस अर्थ को दोबारा कहती हैं जो पहले ही स्पष्ट हो चुका होता है।
काव्य में कई बार एक पंक्ति हटाना, एक पंक्ति जोड़ने से अधिक उपयोगी होता है।
इस संग्रह का पुनर्संपादन किया जाए तो कई कविताएँ लगभग बीस से तीस प्रतिशत छोटी होकर अधिक प्रभावी हो सकती हैं।
विशेष रूप से संवादात्मक प्रेम-कविताओं में भाव की पुनरावृत्ति है।
‘तुम मुझे बहुत प्रिय हो’, ‘तुम्हारी याद आती है’, ‘तुम्हारे बिना अधूरापन है’, ‘तुम्हारे आने का इंतजार है’, ‘तुम मुझे समझती हो’, ‘मैं तुम्हें समझना चाहता हूँ’—ये भाव अनेक रूपों में लौटते हैं।
मानवीय अनुभव की दृष्टि से यह स्वाभाविक है।
लेकिन संग्रहात्मक संरचना की दृष्टि से संपादकीय चयन और कठोर हो सकता था।
साठ कविताओं के बजाय यदि कुछ समान भावभूमि वाली कविताओं को हटाकर चालीस-पैंतालीस सबसे मजबूत कविताएँ रखी जातीं, तो संग्रह अधिक सघन और प्रभावशाली बन सकता था।
यह आलोचना कविताओं की ईमानदारी पर नहीं, उनके संपादन पर है।
19. ‘तुम जितना झुठलाती हो’: संबंध का मनोविश्लेषण
‘तुम जितना झुठलाती हो’ संग्रह के उत्तरार्ध की महत्वपूर्ण कविता है।
इसमें प्रेम अब केवल आकर्षण नहीं, बल्कि विश्वास की परीक्षा है।
कवि प्रश्नों के उत्तर चाहता है।
वह स्वीकार करता है कि प्रेम और विश्वास में सभी सवालों के जवाब आवश्यक नहीं होते, लेकिन कुछ प्रश्न अनिवार्य हैं—ताकि संबंध का विश्वास मजबूत रहे।
यह कविता संग्रह में प्रेम की परिपक्व होती समझ को दिखाती है।
प्रेम के आरंभ में कवि प्रिय को देखकर अभिभूत है।
मध्य में वह उसे समझना चाहता है।
बाद में वह संबंध की संरचना पर प्रश्न करता है।
यह क्रम संग्रह को एक अनकही आंतरिक कथा देता है।
हालाँकि कविताएँ संभवतः किसी योजनाबद्ध कथा के क्रम में नहीं लिखी गईं, लेकिन उन्हें लगातार पढ़ने पर ‘मैं’ और ‘तुम’ के संबंध का एक मनोवैज्ञानिक वृत्त निर्मित होता है।
आकर्षण।
निकटता।
अधिकार।
प्रश्न।
दूरी।
स्मृति।
और फिर लौटने की आकांक्षा।
20. माँ: प्रेम का दूसरा और अधिक निर्मल रूप
संग्रह के अंत की ओर ‘माँ! तो वो तुम ही थी’ प्रेम के पूरे अर्थ को बदल देती है।
यहाँ अब ‘तुम’ प्रेमिका नहीं, माँ है।
कवि अपने जीवन की तमाम संवेदनाओं, जीत-हार, दुख-सुख और भावनात्मक अवस्थाओं में जिस उपस्थिति को महसूस करता रहा, अंततः उसे माँ के रूप में पहचानता है।
यह कविता भावुक है।
लेकिन इसकी भावुकता कृत्रिम नहीं लगती।
माँ को लेकर लिखी हिंदी कविताओं में भावुकता से बचना कठिन है, क्योंकि विषय ही ऐसा है। फिर भी यह कविता एक महत्वपूर्ण बात करती है—वह माँ को केवल जैविक संबंध नहीं, बल्कि कवि के भावात्मक व्यक्तित्व की आंतरिक उपस्थिति के रूप में देखती है।
यहाँ संग्रह का ‘तुम’ एक व्यापक अर्थ ग्रहण करता है।
प्रिय स्त्री से आरंभ हुआ संबोधन माँ तक पहुँचता है।
इससे संग्रह में प्रेम की अवधारणा का विस्तार होता है।
21. ‘औरत’: स्त्री को समझने की कोशिश
‘औरत’ कविता में कवि स्वीकार करता है कि सामने न होते हुए भी स्त्री की उपस्थिति बनी रहती है। वह स्त्री को अनेक रूपों में समझने की कोशिश करता है—घुटन, दर्द, अकेलापन, बदलाव और दुनिया को सुंदर बनाने की संभावना के बीच।
कविता की संवेदना मानवीय है।
लेकिन यहाँ भी एक सावधानी आवश्यक है।
स्त्री को बार-बार ‘रहस्य’, ‘अपरिभाषेय’, ‘समझ से परे’ कहने की प्रवृत्ति हिंदी-उर्दू प्रेम-काव्य की पुरानी परंपरा का हिस्सा है।
आधुनिक स्त्री-विमर्श के संदर्भ में स्त्री को रहस्य बनाकर देखने के बजाय उसकी सामाजिक परिस्थितियों, श्रम, अधिकार, इच्छाओं और प्रतिरोधों को अधिक प्रत्यक्ष रूप से समझना जरूरी है।
‘दुबली, पतली और उजली सी’ में कवि यह कार्य अधिक सफलतापूर्वक करता है, क्योंकि वहाँ स्त्री एक जीवित सामाजिक परिस्थिति के भीतर दिखाई देती है।
‘औरत’ में संवेदना अधिक है, लेकिन ठोस सामाजिकता अपेक्षाकृत कम।
यह अंतर महत्वपूर्ण है।
22. ‘लड्डू’: स्मृति की घरेलू मिठास
‘लड्डू’ एक मामूली घरेलू वस्तु के माध्यम से बचपन, माँ और रिश्तों की स्मृति को जोड़ती है।
कविता में लड्डू केवल मिठाई नहीं रह जाता।
वह बचपन है।
माँ की डाँट है।
मानसिक स्मृति है।
रिश्तों की मिठास है।
और वर्षों बाद लौटती हुई भूली हुई दुनिया है।
यह संग्रह की उन कविताओं में है जो दिखाती हैं कि कवि की रचनात्मक क्षमता प्रेमिका-केंद्रित काव्य से बाहर भी प्रभावी रूप ले सकती है।
दरअसल संग्रह में जहाँ भी कवि किसी ठोस वस्तु या दृश्य से स्मृति को जोड़ता है, कविता अधिक विश्वसनीय और विशिष्ट बनती है।
इस दृष्टि से ‘लड्डू’, ‘कैमरा’, ‘पेन’, ‘चाय का कप’, ‘पीला स्वेटर’ और ‘बनारस के घाट’ जैसी कविताएँ कवि की भावी रचनात्मक दिशा के महत्वपूर्ण संकेत हैं।
23. ‘जीवन राग’: प्रेम का दार्शनिक विस्तार
‘जीवन राग’ में जीवन को अनेक रंगों, सुगंधों और ऋतु-परिवर्तनों से जोड़ते हुए प्रिय को जीवन-संगीत का हिस्सा बनाया गया है। रोजमर्रा की सुबह से लेकर जीवन-यात्रा तक प्रेम की उपस्थिति का अनुभव है।
यहाँ कवि का प्रेम व्यक्तिगत होकर भी जीवन-दर्शन की ओर जाता है।
वह प्रिय के साथ को जीवन की संपूर्णता का पर्याय बनाना चाहता है।
लेकिन कविता की सफलता वहाँ है जहाँ यह दार्शनिक कथन किसी दृश्य में बदलता है।
जहाँ वह सीधे ‘जीवन’, ‘राग’, ‘प्रेम’, ‘सुगंध’, ‘रंग’ जैसे अमूर्त शब्दों पर निर्भर होती है, वहाँ उसका प्रभाव अपेक्षाकृत सामान्य हो जाता है।
यह संग्रह के शिल्प की एक व्यापक समस्या है।
कवि की भावनाएँ प्रामाणिक हैं।
लेकिन कविता को केवल प्रामाणिक भावना नहीं, विशिष्ट भाषा भी चाहिए।
कवि जब ‘नदी’, ‘खिड़की’, ‘कैमरा’, ‘रिक्त स्थान’, ‘स्वेटर’, ‘घाट’ जैसे ठोस बिंब चुनता है तो उसकी कविता अधिक ताकतवर होती है।
जब वह ‘प्यार’, ‘विश्वास’, ‘याद’, ‘सपना’, ‘खुशबू’ जैसे अमूर्त शब्दों पर अधिक निर्भर करता है, तब कविता का व्यक्तित्व थोड़ा धुँधला हो जाता है।
24. भाषा और शिल्प
इस संग्रह की भाषा का मूल स्वभाव है—
सरलता, संवादधर्मिता और आत्मीयता।
यह भाषा पाठक को डराती नहीं।
कविता को बौद्धिक पहेली नहीं बनाती।
इसका लाभ यह है कि पाठक सीधे भावनात्मक अनुभव में प्रवेश कर सकता है।
लेकिन इसी सरलता से एक जोखिम भी जुड़ा है।
कभी-कभी कविता और साधारण वक्तव्य के बीच की दूरी बहुत कम हो जाती है।
इस संग्रह की श्रेष्ठ कविताएँ वे हैं जहाँ सरल भाषा के भीतर कोई अतिरिक्त अर्थ-संरचना जन्म लेती है।
जैसे—
खिड़की,
रुकी हुई नदी,
रिक्त स्थान,
कैमरा,
बनारस का घाट,
चाय का कप,
पीला स्वेटर।
ये प्रतीक कविता को उसके शाब्दिक अर्थ से आगे ले जाते हैं।
दूसरी ओर कुछ कविताएँ अपने कथ्य को लगभग गद्यात्मक संवाद की तरह व्यक्त करती हैं। वहाँ पंक्ति-विभाजन तो है, लेकिन हर पंक्ति अनिवार्य रूप से काव्यात्मक नहीं बनती।
यह समकालीन मुक्तछंद की सामान्य समस्या है।
गद्य को छोटी पंक्तियों में तोड़ देना अपने-आप कविता नहीं बना देता।
कविता के भीतर शब्द-संयम, ध्वनि, तनाव, संकेत, विराम और बहुअर्थिता भी आवश्यक हैं।
डॉ. मिश्रा की कविताओं में इन गुणों की उपस्थिति असमान है।
कुछ कविताओं में वे बहुत प्रभावी हैं।
कुछ में कम।
25. बिंब और प्रतीक
संग्रह का बिंब-विधान अत्यधिक जटिल नहीं है।
कवि कठिन और दुर्बोध प्रतीकों से बचता है।
यह उसकी सचेत काव्य-प्रवृत्ति प्रतीत होती है।
प्रमुख बिंब हैं—
आँखें,
खुशबू,
बारिश,
नदी,
रास्ते,
शहर,
घर,
खिड़की,
स्मृति,
कैमरा,
घाट,
चाय,
मोबाइल,
जूते,
पेन।
इनमें नदी, खिड़की, रिक्त स्थान और शहर विशेष रूप से प्रभावी हैं।
नदी दबे हुए भाव का प्रतीक बनती है।
खिड़की स्वतंत्रता और संभावना का।
रिक्त स्थान अनुपस्थिति का।
शहर स्मृति और प्रिय के अस्तित्व का।
कैमरा स्मृति को बचाने की असफल मानवीय कोशिश का।
यही प्रतीक संग्रह को केवल आत्मकथात्मक प्रेम-डायरी होने से बचाते हैं।
26. शीर्षक का अर्थ: ‘इस बार तुम्हारे शहर में’
संग्रह का शीर्षक अत्यंत आकर्षक है।
“इस बार तुम्हारे शहर में” अपने भीतर यात्रा, दूरी, स्मृति, पुनर्मिलन और अनिश्चितता सब समेटे हुए है।
‘इस बार’ का अर्थ है—पहले भी कुछ हुआ है।
‘तुम्हारे’ का अर्थ है—यह शहर मेरा नहीं, तुम्हारा है।
‘शहर’ केवल भूगोल नहीं; प्रिय की उपस्थिति से निर्मित भावात्मक स्थान है।
इसलिए शीर्षक में एक पूरी प्रेम-कथा छिपी हुई है।
कवि का आना केवल किसी नगर में प्रवेश करना नहीं।
वह दूसरे व्यक्ति की दुनिया में प्रवेश करने का प्रयास है।
शीर्षक कविता संग्रह के अंत में रखी गई है, जिससे पूरी पुस्तक मानो उस शहर की ओर धीरे-धीरे बढ़ती हुई दिखाई देती है।
यह संपादकीय दृष्टि से प्रभावी चयन है।
27. संग्रह की प्रमुख उपलब्धियाँ
समग्र रूप से देखें तो इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी भावनात्मक प्रामाणिकता है।
कवि अपने अनुभव को सजाकर महान बनाने की कोशिश नहीं करता।
उसका प्रेम वास्तविक मनुष्य का प्रेम है।
उसमें ईर्ष्या भी है।
अधिकार भी।
नाराज़गी भी।
भरोसा भी।
असुरक्षा भी।
दूसरी उपलब्धि है दैनिक जीवन को कविता में लाना।
तीसरी है संवादात्मक भाषा।
चौथी है स्मृति की सघन उपस्थिति।
पाँचवीं है छोटी वस्तुओं में बड़ा भाव खोजने की क्षमता।
छठी है भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थानों का भावात्मक रूपांतरण।
और सातवीं उपलब्धि है कवि की वह आत्मस्वीकारोक्ति जिसमें वह स्वयं को प्रेम का विजेता नहीं, प्रेम में लगातार सीखता हुआ मनुष्य प्रस्तुत करता है।
28. संग्रह की सीमाएँ: एक ईमानदार मूल्यांकन
इस संग्रह की साहित्यिक समीक्षा तभी ईमानदार होगी जब उसकी कमजोरियों पर भी उतनी ही स्पष्टता से विचार किया जाए।
पहली सीमा: विषयगत पुनरावृत्ति
प्रेम और स्मृति के कई भाव बार-बार लौटते हैं।
कुछ कविताएँ स्वतंत्र रूप से सुंदर हैं, किंतु संग्रह में साथ पढ़े जाने पर एक-दूसरे का प्रभाव कम करती हैं।
दूसरी सीमा: अत्यधिक व्याख्या
कवि कई बार बिंब प्रस्तुत करने के बाद उसका अर्थ भी बता देता है।
पाठक पर विश्वास बढ़ाया जा सकता था।
तीसरी सीमा: सपाटबयानी
कुछ कविताएँ अनुभव का काव्यात्मक रूपांतरण करने के बजाय अनुभव का सीधा विवरण बन जाती हैं।
चौथी सीमा: अमूर्त शब्दों की पुनरावृत्ति
प्रेम, विश्वास, याद, सपना, खुशबू, इंतजार जैसे शब्द बहुत अधिक आते हैं।
इनके स्थान पर अधिक ठोस, विशिष्ट और अप्रत्याशित बिंब कविता को अधिक निजी पहचान दे सकते थे।
पाँचवीं सीमा: कठोर संपादन का अभाव
संग्रह में लगभग साठ कविताएँ हैं। इनमें से यदि अधिक समान भावभूमि वाली कुछ कविताएँ हटाकर चयन सघन किया जाता, तो पुस्तक की समग्र शक्ति बढ़ती।
छठी सीमा: सामाजिक चेतना की असमानता
पहली कविता सामाजिक हस्तक्षेप की जो बड़ी संभावना घोषित करती है, वह पूरे संग्रह में समान रूप से विकसित नहीं होती।
सातवीं सीमा: स्त्री की छवि
कुछ कविताओं में स्त्री को रहस्य और ‘समझ से परे’ अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत करने की पारंपरिक प्रवृत्ति दिखाई देती है। इसके बरक्स जहाँ स्त्री सामाजिक परिस्थिति और व्यक्तित्व के साथ आती है, कविता अधिक आधुनिक और प्रभावशाली बनती है।
29. फिर भी इस संग्रह को क्यों पढ़ा जाना चाहिए?
क्योंकि यह संग्रह किसी कृत्रिम काव्य-मुद्रा से नहीं लिखा गया।
यह अनुभव से लिखा गया है।
इसका कवि साहित्यिक प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए कठिन कविता लिखने का प्रयास नहीं करता।
वह अपनी जिंदगी के अनुभवों को बचाना चाहता है।
प्रेम में कही-अनकही बातों को।
शहरों को।
स्मृतियों को।
लोगों को।
माँ को।
संबंधों को।
एक कप चाय को।
एक कैमरे को।
एक स्वेटर को।
और शायद सबसे अधिक उस ‘तुम’ को, जिसके माध्यम से वह स्वयं को समझने की कोशिश करता है।
इसलिए इस संग्रह को एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो कहा जा सकता है—
यह प्रेमिका को संबोधित कविता-संग्रह कम और प्रेम के माध्यम से स्वयं को समझते मनुष्य की आत्मकथा अधिक है।
निष्कर्ष
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ आधुनिक हिंदी कविता में प्रेम, संबंध और स्मृति की सहज अभिव्यक्ति का एक आत्मीय दस्तावेज है। इसकी कविताएँ आधुनिक मनुष्य की उस भावनात्मक दुनिया को सामने लाती हैं जिसमें मोबाइल और कैमरा हैं, शहर और पहाड़ हैं, चाय और स्वेटर हैं, लेकिन इनके बीच मनुष्य की मूल आवश्यकता अब भी वही है—किसी का साथ, किसी का विश्वास, किसी की प्रतीक्षा और किसी की स्मृति।
संग्रह का कवि मूलतः संबंधों का कवि है।
वह क्रांति की बड़ी घोषणाओं की तुलना में मनुष्य के भीतर घट रही छोटी हलचलों को अधिक विश्वसनीय ढंग से पकड़ता है।
उसकी सबसे बड़ी पूँजी उसका अनुभव है।
उसकी सबसे बड़ी चुनौती उस अनुभव को और अधिक कलात्मक अनुशासन देना है।
जहाँ वह अपने भाव पर भरोसा करके उसे किसी ठोस बिंब में रखता है, वहाँ उसकी कविता चमकती है।
जहाँ वह भाव को समझाने लगता है, वहाँ कविता कुछ कमजोर होती है।
इस संग्रह की श्रेष्ठ दिशा ‘दुबली, पतली और उजली सी’, ‘तस्वीर खींचना’, ‘तुम्हें मनाने के’, ‘सिर्फ होने से बात नहीं होती’, ‘कैमरा’, ‘आज मेरे अंदर रुकी हुई एक नदी’, ‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’, ‘बनारस के घाट’, ‘माँ! तो वो तुम ही थी’ और ‘लड्डू’ जैसी कविताओं में दिखाई देती है। इन रचनाओं में अनुभव, वस्तु, प्रतीक और भाषा एक-दूसरे से स्वाभाविक रूप में जुड़ते हैं।
अंततः ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ को उसकी अपूर्णताओं सहित पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि उसकी अपूर्णताएँ भी कई जगह उसकी मानवीयता का हिस्सा हैं। यह कोई कृत्रिम रूप से तराशा गया निर्जीव काव्य-शिल्प नहीं, बल्कि एक जीवित संवेदनशील मनुष्य की भावनात्मक यात्रा है। इसमें प्रेम कई बार दोहराता है, क्योंकि जीवन में भी हम उन्हीं लोगों को बार-बार याद करते हैं; प्रश्न लौटते हैं, क्योंकि कुछ उत्तर कभी अंतिम नहीं होते; शहर लौटते हैं, क्योंकि कुछ स्थान हमारे भीतर बस जाते हैं; और ‘तुम’ बार-बार आती हो, क्योंकि इस संग्रह के कवि के लिए दूसरे तक पहुँचने का रास्ता अंततः स्वयं तक पहुँचने का रास्ता भी है।
इसी अर्थ में इस संग्रह का वास्तविक काव्य-वाक्य शायद यह है—
मनुष्य अपने जीवन में जिन लोगों को प्रेम करता है, वे केवल उसके साथ नहीं रहते; वे उसकी भाषा, स्मृति, वस्तुओं, शहरों और अंततः उसके पूरे व्यक्तित्व में फैल जाते हैं।
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की कविता की मूल शक्ति इसी फैलाव को दर्ज करने में है।
और इसीलिए ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ प्रेम का संग्रह होते हुए भी प्रेम से कहीं अधिक—स्मृति, आत्मपहचान, मनुष्य की भावनात्मक असुरक्षा और संबंधों को बचाए रखने की जिद का संग्रह है।
प्रेम, स्मृति और समकालीन जीवन का आत्मीय काव्य-वृत्त
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ का आलोचनात्मक अध्ययन
सारांश
समकालीन हिंदी कविता में निजी जीवन, प्रेम, स्मृति, अकेलापन, पारिवारिक संबंध, महानगरीय अनुभव और रोजमर्रा की वस्तुओं ने नई काव्यात्मक अर्थवत्ता प्राप्त की है। डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ इसी व्यापक समकालीन काव्य-परिदृश्य में प्रेम और संबंधों की निजी अनुभूतियों को सामाजिक जीवन, स्मृति और स्थान-बोध से जोड़ने का प्रयास करता है। संग्रह में लगभग साठ कविताएँ हैं, जिनमें प्रेम और ‘मैं–तुम’ संबंध केंद्रीय होते हुए भी स्त्री-अनुभव, माँ, बचपन, भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता, बनारस, पहाड़ी जीवन, विश्वविद्यालयीय परिवेश तथा कैमरा, मोबाइल, पेन, नेलकटर, जूते और लड्डू जैसी साधारण वस्तुओं तक विस्तृत अनुभव-संसार उपस्थित है।
संग्रह की प्रमुख शक्ति उसकी भावनात्मक प्रामाणिकता, सहज संवादधर्मी भाषा और दैनिक जीवन के सामान्य अनुभवों में कविता खोजने की क्षमता है। साथ ही, विषयगत पुनरावृत्ति, कुछ स्थानों पर सपाटबयानी, अनुभव की अतिरिक्त व्याख्या तथा अपेक्षित काव्यात्मक संपादन का अभाव इसकी सीमाएँ भी हैं। प्रस्तुत अध्ययन में संग्रह की प्रेम-दृष्टि, स्मृति-बोध, स्त्री-संवेदना, सामाजिक चेतना, स्थान और वस्तु-बोध, भाषा-शिल्प तथा काव्यगत उपलब्धियों और सीमाओं का आलोचनात्मक परीक्षण किया गया है।
बीज शब्द: प्रेम, स्मृति, समकालीन हिंदी कविता, संबंध, शहर, स्त्री-संवेदना, वस्तु-बोध, आत्मानुभूति, मुक्तछंद।
1. प्रस्तावना
कविता मनुष्य के बाहरी संसार का जितना दस्तावेज होती है, उतना ही उसके अंतर्जगत का भी। प्रत्येक महत्वपूर्ण कविता अपने समय को केवल राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं के माध्यम से दर्ज नहीं करती; वह यह भी बताती है कि उस समय का मनुष्य कैसे प्रेम करता था, किस प्रकार अकेला होता था, किन वस्तुओं से भावनात्मक संबंध बनाता था, किन स्थानों को स्मृति में बचाकर रखता था और अपने सबसे निकट संबंधों के भीतर किस प्रकार स्वयं को पहचानता था।
समकालीन जीवन ने मनुष्य को अभूतपूर्व संचार-सुविधाएँ दी हैं, किंतु इसी के साथ संबंधों की जटिलता भी बढ़ी है। मोबाइल के माध्यम से दूर बैठा व्यक्ति क्षण भर में हमारे सामने उपस्थित हो सकता है, लेकिन निकट बैठे दो व्यक्तियों के बीच संवादहीनता भी संभव है। तस्वीरें हजारों की संख्या में सुरक्षित रखी जा सकती हैं, किंतु बीता हुआ समय वापस नहीं लाया जा सकता। शहर बदले जा सकते हैं, लेकिन उनसे जुड़ी स्मृतियाँ मनुष्य के भीतर बनी रहती हैं। प्रेम के लिए नए माध्यम उपलब्ध हैं, किंतु प्रेम की मूल मानवीय आकांक्षाएँ—विश्वास, निकटता, संवाद और साथ—आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ इसी आधुनिक भावात्मक संसार की अभिव्यक्ति है। संग्रह का शीर्षक ही एक रोचक काव्यात्मक परिस्थिति निर्मित करता है। इसमें ‘इस बार’, ‘तुम्हारे’ और ‘शहर’—तीनों शब्द अर्थपूर्ण हैं। ‘इस बार’ किसी पूर्व अनुभव का संकेत देता है; ‘तुम्हारे’ से आत्मीय संबंध जुड़ता है और ‘शहर’ एक भौगोलिक स्थान से अधिक स्मृति और संबंध का भावात्मक भूगोल बन जाता है।
संग्रह में प्रेम प्रमुख स्वर है, किंतु यह कहना अधूरा होगा कि यह केवल प्रेम-कविताओं का संग्रह है। इसमें निजी संबंधों से बाहर निकलकर सामाजिक अन्याय, स्त्री की चुप्पी, भाषा और अस्मिता, माँ और बचपन, बनारस की सांस्कृतिक स्मृति तथा रोजमर्रा की वस्तुओं के साथ मनुष्य के संबंध तक अनेक विषय आते हैं।
इसलिए संग्रह का उचित अध्ययन उसके प्रेम-केंद्र को स्वीकार करते हुए उसके व्यापक मानवीय संसार को पहचानने में है।
2. कविता के सामाजिक दायित्व की भूमिका
संग्रह का आरंभ ‘कविताओं के शब्द’ से होना महत्वपूर्ण है। यह कविता एक प्रकार से कवि की काव्य-दृष्टि का प्रारंभिक वक्तव्य प्रस्तुत करती है। कवि चाहता है कि उसके शब्द केवल सौंदर्य और व्यक्तिगत अनुभूतियों तक सीमित न रहें, बल्कि संवेदनहीनता और अन्याय के विरुद्ध भी खड़े हों। कविता में सामाजिक प्रतिरोध, स्त्री-विरोधी हिंसा और आशा को बचाए रखने की आकांक्षा एक साथ दिखाई देती है।
यहाँ कविता को सामाजिक हस्तक्षेप के माध्यम के रूप में देखा गया है।
लेकिन संग्रह को समग्रता में पढ़ने पर यह भी स्पष्ट होता है कि कवि का मुख्य रचनात्मक क्षेत्र प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रतिरोध की अपेक्षा मानवीय संबंध है। इसलिए पहली कविता में घोषित सामाजिक सरोकार आगे समान तीव्रता के साथ हर कविता में उपस्थित नहीं रहता।
यह तथ्य संग्रह की सीमा से अधिक उसकी वास्तविक रचनात्मक प्रकृति को स्पष्ट करता है।
कवि की मूल रुचि बाहरी व्यवस्था के बड़े आख्यानों की तुलना में व्यक्ति के भीतर घटित होने वाले छोटे परिवर्तनों में अधिक है।
फिर भी ‘दुबली, पतली और उजली सी’, ‘मैंने कुछ गालियाँ सीखी हैं’, ‘बनारस के घाट’, ‘लंकैरिंग’, ‘औरत’ और ‘लड्डू’ जैसी रचनाएँ बताती हैं कि उसका निजी संसार सामाजिक संसार से पूरी तरह अलग नहीं है।
3. ‘तस्वीर खींचना’: कविता और आत्म-अन्वेषण
संग्रह की महत्वपूर्ण आरंभिक कविताओं में ‘तस्वीर खींचना’ को कवि की पूरी रचना-प्रक्रिया के रूपक के रूप में पढ़ा जा सकता है।
तस्वीर खींचने का अर्थ सामान्यतः बाहरी दृश्य को कैमरे में सुरक्षित करना है, लेकिन कविता इसे स्वयं के उन हिस्सों को देखने की इच्छा से जोड़ती है जिन्हें मनुष्य प्रत्यक्षतः देख नहीं पाता। इस प्रक्रिया में कैमरे का लेंस आत्म-अन्वेषण का माध्यम बन जाता है।
वस्तुतः पूरा संग्रह इसी अर्थ में आत्म-चित्रों की एक श्रृंखला है।
कवि जब ‘तुम’ को देखता है, तब वह केवल दूसरे व्यक्ति को नहीं देख रहा होता; वह स्वयं को भी उसके माध्यम से पहचान रहा होता है।
प्रेम इसलिए यहाँ आत्म-अन्वेषण की प्रक्रिया बन जाता है।
यह संग्रह का महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक पक्ष है।
प्रेमिका कवि के लिए केवल प्रेम का विषय नहीं; वह एक दर्पण भी है।
उसके सामने कवि अपनी असुरक्षाओं, अपेक्षाओं, कमजोरियों, अधिकार-बोध और भावनात्मक निर्भरता को पहचानता है।
यहीं से संग्रह की आत्मीयता उत्पन्न होती है।
4. संग्रह का केंद्रीय संबोधन: ‘मैं’ और ‘तुम’
संग्रह की काव्य-संरचना में सबसे महत्वपूर्ण सर्वनाम हैं—‘मैं’ और ‘तुम’।
इन दोनों के बीच ही अधिकांश प्रेम-कविताओं का भावात्मक संसार निर्मित होता है।
लेकिन संग्रह का ‘तुम’ स्थिर नहीं है।
वह कभी प्रेमिका है।
कभी साथी।
कभी अनुपस्थित व्यक्ति।
कभी स्मृति।
कभी माँ।
और कई बार वह ऐसा भावात्मक केंद्र है जिसके आसपास कवि का पूरा आत्मबोध निर्मित होता है।
‘तुम जो सुलझाती हो’ में स्त्री को अनेक विरोधी गुणों के माध्यम से समझने का प्रयास किया गया है। वह धूप जैसी है और ठंडक जैसी भी; वह सरल दिखाई देती है लेकिन उसके भीतर अनेक जटिलताएँ हैं। कविता अंततः स्त्री को पूरी तरह समझ पाना कठिन मानती है।
इस कविता में स्त्री के प्रति आकर्षण और विस्मय है।
लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यहाँ स्त्री को ‘रहस्य’ मानने की पारंपरिक काव्य-प्रवृत्ति भी दिखाई देती है।
संग्रह की अन्य कविताओं में स्त्री का चित्र अधिक वास्तविक और मानवीय है। वह नाराज़ होती है, प्रश्न पूछती है, असहमत होती है, संबंध में अपनी शर्तें रखती है और कवि की भावनात्मक दुनिया को चुनौती भी देती है।
यही स्त्री-छवि अधिक विश्वसनीय है।
5. प्रेम का व्याकरण
संग्रह की प्रेम-कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें प्रेम किसी अमूर्त आदर्श के रूप में नहीं आता।
वह व्यवहार में घटित होता है।
प्रेम में रूठना है।
मनाना है।
प्रतीक्षा है।
फोन है।
संदेश है।
प्रश्न हैं।
चुप्पियाँ हैं।
गलतफहमियाँ हैं।
और बार-बार संबंध को बचाने की कोशिश है।
‘तृषिता’ और ‘तुम्हें मनाने के’ जैसी कविताएँ इस प्रेम-मनोविज्ञान को सामने लाती हैं। ‘तुम्हें मनाने के’ का मूल भाव विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि किसी व्यक्ति को जानना और उसे मनाना जानना अलग बातें हैं।
यह एक साधारण-सा कथन दिखाई दे सकता है, किंतु इसके भीतर संबंध का गहरा अनुभव छिपा है।
मनुष्य दूसरे व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ जान सकता है।
लेकिन उसके मौन का अर्थ जानना कठिन है।
उसकी नाराज़गी के पीछे छिपे भय को समझना कठिन है।
उसे किस शब्द से चोट लगेगी और किस मौन से सांत्वना मिलेगी—यह किसी औपचारिक ज्ञान से नहीं सीखा जा सकता।
यही प्रेम का ‘व्याकरण’ है।
और इस संग्रह का कवि इसी व्याकरण को सीखता हुआ दिखाई देता है।
6. प्रश्नों से निर्मित प्रेम
इस संग्रह में प्रेम का संसार जितना स्मृतियों से निर्मित है, उतना ही प्रश्नों से भी।
यह विशेषता इसे पारंपरिक रूमानी प्रेम-काव्य से अलग करती है।
यहाँ प्रेम केवल आत्मसमर्पण नहीं है।
वह लगातार संवाद की माँग करता है।
‘सवालों से बंधी’, ‘कही-अनकही’, ‘न जाने कितनी बार’ और ‘तुम जितना झुठलाती हो’ जैसी कविताओं में प्रेम के भीतर प्रश्नों की उपस्थिति महत्वपूर्ण है।
विशेष रूप से ‘तुम जितना झुठलाती हो’ में कवि कुछ प्रश्नों के उत्तर को संबंध के विश्वास के लिए आवश्यक मानता है।
यह प्रेम की परिपक्व समझ है।
प्रेम का अर्थ यह नहीं कि प्रश्न समाप्त हो जाएँ।
वास्तविक प्रेम में प्रश्न अधिक गहरे हो सकते हैं, क्योंकि व्यक्ति दूसरे के जीवन में अधिक हिस्सेदारी चाहता है।
लेकिन यहाँ एक आलोचनात्मक प्रश्न भी उठता है।
प्रेम में प्रश्न कब संवाद रहते हैं और कब अधिकार या निगरानी में बदल जाते हैं?
संग्रह इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं देता, लेकिन कई कविताओं के भीतर यह तनाव मौजूद है।
यही तनाव उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से रोचक बनाता है।
7. ‘दुबली, पतली और उजली सी’: मौन स्त्री का संसार
संग्रह की अधिक उल्लेखनीय कविताओं में ‘दुबली, पतली और उजली सी’ का स्थान महत्वपूर्ण है।
कविता की स्त्री भीड़ में होते हुए भी अनुपस्थित-सी है। उसकी चुप्पी सामान्य चुप्पी नहीं; उसमें किसी अनकहे जीवन-संघर्ष की संभावना है। कवि उसके भीतर जैसे कोई अज्ञात महाकाव्य पढ़ना चाहता है। अंततः ‘खिड़की’ का बिंब कविता को विशेष अर्थ देता है।
खिड़की यहाँ केवल वास्तु का हिस्सा नहीं है।
वह मुक्ति है।
संवाद है।
बाहर की दुनिया से संपर्क है।
संभावना है।
और शायद अपने जीवन को अपनी तरह जीने की इच्छा भी।
यह कविता इसलिए प्रभावी है क्योंकि कवि स्त्री की समस्या का कोई तैयार समाधान प्रस्तुत नहीं करता।
वह केवल उसकी चुप्पी को सुनने का प्रयास करता है।
यह संग्रह की उन कविताओं में है जहाँ कवि का सामाजिक और मानवीय बोध प्रेम-केंद्रित निजी संसार से आगे जाता है।
8. प्रेम और स्मृति
इस संग्रह में स्मृति प्रेम का परिणाम नहीं, बल्कि उसका दूसरा रूप है।
व्यक्ति अनुपस्थित हो सकता है।
लेकिन स्मृति में उसकी उपस्थिति बनी रहती है।
कई बार अनुपस्थिति ही उपस्थिति को अधिक तीव्र बनाती है।
‘आजकल ये पहाड़ी रास्ते’, ‘तुम मिलती तो बताता’, ‘तुम्हारे जाने के बाद’, ‘आज मेरे अंदर रुकी हुई एक नदी’ और शीर्षक कविता सहित अनेक रचनाओं में स्मृति का यह स्वर उपस्थित है।
‘आज मेरे अंदर रुकी हुई एक नदी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ वर्षों से भीतर रुकी हुई नदी किसी प्रिय उपस्थिति की आहट से बहने के लिए तैयार होती है।
‘नदी’ संग्रह के प्रभावी प्रतीकों में से है।
यह भीतर दबे प्रेम का प्रतीक है।
समय का भी।
स्मृति का भी।
और उस भावात्मक ऊर्जा का भी जो वर्षों बाद अचानक सक्रिय हो सकती है।
इस कविता में कवि बताता कम है और बिंब के माध्यम से अनुभव अधिक कराता है।
यही कारण है कि यह उसकी अधिक सफल काव्यात्मक दिशाओं में से एक है।
9. अनुपस्थिति की काव्यात्मकता
प्रेम-काव्य में मिलन की तुलना में विरह की परंपरा अधिक समृद्ध रही है। ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ भी इस परंपरा से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ता है, किंतु इसका विरह आधुनिक जीवन का विरह है।
यहाँ प्रिय व्यक्ति पूरी तरह अप्राप्य नहीं।
फोन किया जा सकता है।
संदेश भेजा जा सकता है।
तस्वीर देखी जा सकती है।
लेकिन तकनीकी उपलब्धता भावात्मक दूरी को समाप्त नहीं करती।
यही आधुनिक प्रेम का विरोधाभास है।
‘तुम्हारे जाने के बाद’ में घर वस्तुतः खाली नहीं होता, लेकिन प्रिय की अनुपस्थिति पूरे वातावरण को बदल देती है।
यहाँ अनुपस्थिति भौतिक रिक्तता नहीं है।
यह भावात्मक रिक्तता है।
और इसी अनुभव को ‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’ अधिक अवधारणात्मक रूप देती है।
विद्यालय में रिक्त स्थान भरना सरल है।
जीवन में बने रिक्त स्थान नहीं।
यह साधारण शैक्षिक मुहावरा कविता में अस्तित्वगत अर्थ ग्रहण करता है।
यह संग्रह की उल्लेखनीय काव्य-युक्तियों में है।
10. साधारण वस्तुओं में असाधारण स्मृति
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की काव्य-दृष्टि की एक महत्वपूर्ण विशेषता है कि वे साधारण वस्तुओं को कविता का विषय बनाने से संकोच नहीं करते।
कैमरा।
पेन।
मोबाइल।
नेलकटर।
जूते।
चाय का कप।
पीला स्वेटर।
लड्डू।
इन वस्तुओं का संसार संग्रह को विशिष्ट समकालीनता देता है।
इनमें ‘कैमरा’ विशेष रूप से प्रभावी कविता है। मनुष्य तस्वीरें इसलिए लेता है कि क्षणों को सुरक्षित रख सके, लेकिन कैमरा समय वापस नहीं ला सकता। प्रिय के दूर होने पर तस्वीर बचती है, अनुभव नहीं।
यह कविता छोटी है, किंतु उसका अर्थ व्यापक है।
वास्तव में आधुनिक मनुष्य का जीवन छवियों से भर गया है।
हम हर क्षण को रिकॉर्ड करते हैं।
लेकिन रिकॉर्ड किया हुआ जीवन, जिया हुआ जीवन नहीं होता।
यह अंतर कविता को मार्मिक बनाता है।
‘लड्डू’ भी इसी तरह साधारण वस्तु से स्मृति की बड़ी दुनिया निर्मित करती है। उसमें बचपन, माँ, डाँट और रिश्तों की मिठास एक घरेलू वस्तु के माध्यम से लौटती है।
इन कविताओं में कवि की भाषा सबसे अधिक स्वाभाविक दिखाई देती है।
11. शहर का काव्य और स्मृति का भूगोल
संग्रह के शीर्षक में ‘शहर’ की उपस्थिति आकस्मिक नहीं है।
इस संग्रह में स्थान भावनाओं से जुड़े हुए हैं।
पहाड़ स्मृति बन जाते हैं।
बनारस संस्कृति और मृत्यु-बोध का स्थल बन जाता है।
लंका विश्वविद्यालयीय जीवन का सांस्कृतिक दस्तावेज बनती है।
और प्रिय का शहर प्रेम की पूरी भावात्मक यात्रा का केंद्र बन जाता है।
‘बनारस के घाट’ में घाटों को जीवन के विभिन्न वर्गों और अवस्थाओं को जोड़ने वाले सांस्कृतिक स्थल के रूप में देखा गया है। वहाँ आरंभ और अंत, आस्था और मृत्यु, व्यक्ति और समुदाय एक साथ उपस्थित हैं।
कविता का विचार महत्वपूर्ण है।
हालाँकि इसमें दृश्यात्मकता और बढ़ सकती थी।
बनारस जैसा शहर केवल विचार से नहीं, रंग, गंध, ध्वनि और गति से भी बनता है। यदि इन संवेदनात्मक स्तरों को अधिक विस्तार मिलता तो कविता और अधिक प्रभावी हो सकती थी।
12. ‘लंकैरिंग’: स्मृति का सांस्कृतिक अभिलेख
‘लंकैरिंग’ संग्रह की असामान्य कविता है।
इसमें विश्वविद्यालयीय परिवेश, दुकानों, स्थानों, खान-पान और स्थानीय जीवन का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
परंपरागत काव्य-कसौटी से देखें तो इसमें सूचीकरण और विवरण अधिक है।
लेकिन सांस्कृतिक स्मृति की दृष्टि से इसका महत्व अलग है।
शहरों का वास्तविक जीवन केवल उनके स्मारकों में नहीं रहता।
वह चाय की दुकानों में रहता है।
छोटे भोजनालयों में।
चौराहों में।
छात्रों की बातचीत में।
ऐसे स्थान समय के साथ बदल जाते हैं।
साहित्य उन्हें बचा सकता है।
इस अर्थ में ‘लंकैरिंग’ को कविता और सांस्कृतिक दस्तावेज के बीच स्थित रचना कहा जा सकता है।
13. भाषा और अस्मिता
‘मैंने कुछ गालियाँ सीखी हैं’ संग्रह की सामाजिक चेतना को एक अलग दिशा देती है।
यह कविता भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता के प्रश्न से जुड़ती है। व्यक्ति जब अपनी भाषाई या क्षेत्रीय पहचान के प्रति अपमान महसूस करता है तो उसकी प्रतिक्रिया बदलती है।
कविता का कथ्य प्रासंगिक है।
लेकिन शिल्प की दृष्टि से इसमें प्रत्यक्ष कथन अपेक्षाकृत अधिक है।
कवि अपने विचार को स्पष्ट करने की चिंता में कई बार कविता के संकेतात्मक गुण को कम कर देता है।
यह संग्रह की व्यापक शिल्पगत सीमा है।
कवि के पास कहने के लिए बहुत कुछ है।
कई बार वह सब कुछ कह देना चाहता है।
जबकि कविता की शक्ति कई बार न कहने में होती है।
14. माँ और प्रेम का विस्तृत अर्थ
संग्रह के उत्तरार्ध में ‘माँ! तो वो तुम ही थी’ प्रेम की अवधारणा को नया विस्तार देती है।
यहाँ ‘तुम’ का अर्थ बदल जाता है।
जीवन के संघर्ष, संवेदना, जीत और हार के बीच जिस अदृश्य उपस्थिति का अनुभव कवि करता रहा, वह अंततः माँ के रूप में सामने आती है।
यह कविता संग्रह के पूरे संबोधन को नए ढंग से पढ़ने की संभावना देती है।
अब ‘तुम’ केवल प्रेमिका नहीं रह जाती।
वह जीवन में उन सभी आत्मीय संबंधों का संकेत हो सकती है जिनके माध्यम से मनुष्य स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है।
माँ की कविता भावुक है, किंतु उसकी भावुकता स्वाभाविक है।
यह संग्रह के प्रेम को रोमानी संबंध से बाहर निकालकर पारिवारिक आत्मीयता तक विस्तृत करती है।
15. स्त्री-दृष्टि: उपलब्धि और सीमा
संग्रह में स्त्री अनेक रूपों में उपस्थित है।
प्रेमिका।
साथी।
मौन लड़की।
माँ।
‘औरत’।
इन छवियों के बीच कवि की स्त्री-दृष्टि को समझा जा सकता है।
एक ओर कवि स्त्री के दर्द और चुप्पी को पहचानने की कोशिश करता है।
दूसरी ओर कुछ कविताओं में वह स्त्री को रहस्यमय और पूरी तरह न समझे जा सकने वाले अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत करता है।
‘दुबली, पतली और उजली सी’ जैसी कविता इस दृष्टि से अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि वहाँ स्त्री किसी अमूर्त ‘नारी-रहस्य’ में नहीं बदलती। वह एक वास्तविक मनुष्य की तरह सामने आती है।
इसके विपरीत जहाँ स्त्री को केवल ‘समझना कठिन है’ जैसे निष्कर्ष में रखा जाता है, वहाँ कविता पारंपरिक स्त्री-छवि के निकट पहुँच जाती है।
कवि की आगामी रचनात्मक यात्रा के लिए यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकता है।
स्त्री को ‘समझने’ की अपेक्षा उसे स्वयं बोलने की अधिक जगह देना कविता को नई शक्ति दे सकता है।
16. भाषा का सहज सौंदर्य
संग्रह की भाषा उसकी सबसे बड़ी शक्तियों में है।
कवि कठिन शब्दों के माध्यम से अपनी कविता को गंभीर सिद्ध नहीं करना चाहता।
उसकी भाषा बोलचाल के निकट है।
इस कारण पाठक और कविता के बीच दूरी कम होती है।
कई कविताएँ किसी आत्मीय बातचीत की तरह पढ़ी जाती हैं।
यह गुण विशेष रूप से प्रेम-कविताओं के लिए अनुकूल है।
लेकिन सरलता अपने-आप काव्यात्मकता नहीं बनती।
संग्रह की श्रेष्ठ कविताओं में सरल भाषा के भीतर कोई बिंब या प्रतीक सक्रिय होता है।
जैसे—
रुकी हुई नदी,
बंद खिड़की,
रिक्त स्थान,
कैमरा,
पीला स्वेटर,
शहर।
ये बिंब कविता को सामान्य वक्तव्य से अलग करते हैं।
जहाँ ऐसा बिंबात्मक रूपांतरण नहीं होता, वहाँ कुछ रचनाएँ गद्यात्मक कथन के निकट चली जाती हैं।
17. मुक्तछंद और कथात्मकता
संग्रह की अधिकांश कविताएँ मुक्तछंद में हैं।
कवि छंद के पारंपरिक अनुशासन से मुक्त होकर अनुभव की स्वाभाविक गति का अनुसरण करता है।
इसका लाभ है कि संवाद और स्मृति बिना औपचारिक बाधा के व्यक्त होते हैं।
लेकिन मुक्तछंद का अर्थ केवल वाक्यों को छोटी पंक्तियों में विभाजित करना नहीं है।
मुक्तछंद का भी अपना आंतरिक संगीत होता है।
विराम।
शब्द-चयन।
पुनरावृत्ति।
ध्वनि।
और पंक्ति-विन्यास।
संग्रह की कुछ कविताओं में यह आंतरिक लय प्रभावी है।
कुछ में पंक्ति-विभाजन अपेक्षाकृत यांत्रिक लगता है।
यहाँ अधिक कठोर पुनर्लेखन कविता की शक्ति बढ़ा सकता था।
18. संग्रह में पुनरावृत्ति की समस्या
किसी भी प्रेम-केंद्रित संग्रह के सामने सबसे बड़ी चुनौती विषयगत पुनरावृत्ति होती है।
इस संग्रह में भी यह समस्या उपस्थित है।
प्रिय की स्मृति।
प्रतीक्षा।
नाराज़गी।
आँखें।
खुशबू।
सपने।
विश्वास।
दूरी।
ये भाव बार-बार लौटते हैं।
जीवन की दृष्टि से यह स्वाभाविक है।
हम जिनसे प्रेम करते हैं, उन्हें बार-बार याद करते हैं।
लेकिन कविता-संग्रह की संरचना जीवन से अलग संपादकीय अनुशासन माँगती है।
कुछ समान भावभूमि वाली कविताओं का चयन अधिक कठोर होता तो संग्रह की समग्र शक्ति बढ़ सकती थी।
यहाँ कवि को अपनी कविता से थोड़ा अधिक निर्मम संपादकीय संबंध रखने की आवश्यकता थी।
हर लिखी हुई कविता का संग्रह में होना आवश्यक नहीं।
कई बार एक अच्छी कविता को बचाने के लिए उसके आसपास की तीन औसत कविताओं को हटाना पड़ता है।
19. सपाटबयानी: सीमा और संभावना
संग्रह की दूसरी महत्वपूर्ण सीमा सपाटबयानी है।
लेकिन इसे पूरी तरह नकारात्मक अर्थ में नहीं समझना चाहिए।
कवि की सीधी भाषा कई बार उसकी ताकत है।
समस्या तब होती है जब कविता किसी भाव को व्यक्त करने के बाद उसका अर्थ भी समझाने लगती है।
उदाहरण के लिए यदि कोई बिंब स्वयं पर्याप्त है तो उसके बाद उसका निष्कर्ष बताना अनावश्यक हो सकता है।
इस संग्रह की कई कविताओं में अंतिम दो-तीन पंक्तियों को हटाने से संभवतः कविता अधिक खुली और प्रभावी हो सकती थी।
पाठक को अर्थ-निर्माण की स्वतंत्रता देना आधुनिक कविता की महत्वपूर्ण विशेषता है।
कवि के भीतर एक शिक्षक भी उपस्थित है।
शिक्षक अर्थ स्पष्ट करना चाहता है।
लेकिन कवि को कभी-कभी अर्थ छिपाना भी पड़ता है।
डॉ. मिश्रा की कविता का भावी विकास शायद इसी संतुलन में निहित है।
20. शीर्षक की सार्थकता
‘इस बार तुम्हारे शहर में’ अत्यंत सफल शीर्षक है।
यह केवल किसी यात्रा का वाक्य नहीं।
इसमें पूरी भावात्मक कथा छिपी है।
‘इस बार’—अर्थात पहले भी कुछ यात्राएँ हुई हैं।
‘तुम्हारे’—अर्थात शहर किसी व्यक्ति की उपस्थिति से अर्थवान है।
‘शहर’—अर्थात स्मृतियों, रास्तों और संबंधों का पूरा भूगोल।
इस शीर्षक की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह पाठक को अधूरी कहानी देता है।
कौन आ रहा है?
किसके शहर में?
पहले क्या हुआ था?
इस बार क्या होगा?
कविता का संसार इन्हीं अनुत्तरित प्रश्नों से बनता है।
संग्रह की लगभग सभी प्रेम-कविताओं को इस शीर्षक के विस्तृत भावात्मक संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
21. संग्रह की प्रमुख साहित्यिक उपलब्धियाँ
समग्र मूल्यांकन में संग्रह की कुछ उपलब्धियाँ स्पष्ट रूप से रेखांकित की जानी चाहिए।
पहली और सबसे बड़ी उपलब्धि है भावनात्मक प्रामाणिकता।
दूसरी है दैनिक जीवन को कविता में बदलने की क्षमता।
तीसरी है प्रेम को केवल सौंदर्य और मिलन नहीं, बल्कि संबंध की कठिन प्रक्रिया के रूप में देखना।
चौथी है स्मृति का सघन संसार।
पाँचवीं है साधारण वस्तुओं का भावात्मक रूपांतरण।
छठी है शहर और स्थान को स्मृति से जोड़ना।
सातवीं है सहज और पाठक-सुलभ भाषा।
और आठवीं है कवि का स्वयं को प्रेम में सर्वज्ञ न मानना।
वह प्रेम सीखता है।
गलतियाँ करता है।
प्रश्न पूछता है।
प्रतीक्षा करता है।
और इसी प्रक्रिया में स्वयं को पहचानता है।
22. संग्रह की प्रमुख सीमाएँ
साहित्यिक ईमानदारी की दृष्टि से इसकी सीमाएँ भी स्पष्ट हैं।
संग्रह में कुछ कविताओं के बीच भावात्मक समानता अधिक है।
कुछ रचनाएँ पर्याप्त संपादन माँगती हैं।
कुछ कविताएँ अनुभव को कविता में बदलने के बजाय सीधे बयान के रूप में छोड़ देती हैं।
अमूर्त शब्दों—प्रेम, याद, विश्वास, सपना, खुशबू—का प्रयोग कई जगह अधिक है।
स्त्री के संदर्भ में कुछ पारंपरिक रूढ़ छवियाँ भी दिखाई देती हैं।
पहली कविता में घोषित सामाजिक सरोकार आगे उतनी व्यापकता से विकसित नहीं होता।
और कुछ लंबी कविताओं में विवरण कविता के केंद्रीय तनाव को कमजोर करता है।
लेकिन इन सीमाओं को कवि की रचनात्मक संभावनाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
क्योंकि संग्रह में अनेक स्थान ऐसे हैं जहाँ वह इन सीमाओं को सफलतापूर्वक पार करता है।
23. समग्र मूल्यांकन
‘इस बार तुम्हारे शहर में’ को किसी एक साहित्यिक खाँचे में रखना कठिन है।
यह प्रेम-कविता का संग्रह है।
लेकिन केवल प्रेम-कविता का नहीं।
यह स्मृतियों का संग्रह है।
लेकिन केवल अतीत का नहीं।
यह निजी अनुभवों का संग्रह है।
लेकिन उसमें समाज भी उपस्थित है।
इसकी मूल संवेदना संबंधों की है।
कवि के लिए मनुष्य का अस्तित्व अकेले में पूरा नहीं होता।
वह दूसरे मनुष्य के साथ अपने संबंध में स्वयं को पहचानता है।
इसीलिए इस संग्रह में ‘तुम’ इतनी बार आती है।
वास्तव में यह ‘तुम’ ही कवि के ‘मैं’ को निर्मित करती है।
इस दृष्टि से संग्रह को प्रेमिका की ओर जाने वाली यात्रा से अधिक स्वयं की ओर लौटने वाली यात्रा कहा जा सकता है।
उपसंहार
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का कविता-संग्रह ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ प्रेम, स्मृति और संबंधों की आत्मीय काव्य-यात्रा है। इसकी कविताएँ जीवन की बड़ी घटनाओं की तुलना में उन छोटे क्षणों को बचाती हैं जो मनुष्य के भावात्मक जीवन को वास्तविक रूप से निर्मित करते हैं।
एक कप चाय।
एक तस्वीर।
एक फोन।
एक स्वेटर।
एक शहर।
एक रुकी हुई नदी।
एक बंद खिड़की।
एक रिक्त स्थान।
और किसी का न होना।
इन सामान्य अनुभवों के भीतर कवि अपने समय के मनुष्य की भावनात्मक कहानी खोजता है।
संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि उसमें अनुभव बनावटी नहीं लगता। कविता कई बार तकनीकी दृष्टि से असमान हो सकती है, लेकिन उसकी संवेदना प्रायः विश्वसनीय रहती है। यही गुण पाठक को उससे जोड़ता है।
फिर भी एक गंभीर आलोचनात्मक मूल्यांकन यह स्वीकार करेगा कि कवि की भावनात्मक ईमानदारी को अधिक कठोर कलात्मक अनुशासन की आवश्यकता है। कम शब्दों में अधिक कहना, कुछ अर्थों को अनकहा छोड़ना, समान भावभूमि वाली कविताओं में चयन करना और ठोस बिंबों पर अधिक भरोसा करना इस काव्य-यात्रा को अधिक सशक्त बना सकता है।
संग्रह की श्रेष्ठ कविताएँ यह प्रमाणित करती हैं कि कवि के पास साधारण जीवन में कविता खोजने की वास्तविक क्षमता है। विशेष रूप से जहाँ स्मृति किसी ठोस वस्तु या दृश्य में रूपांतरित होती है, वहाँ कविता अपनी पूरी शक्ति प्राप्त करती है। ‘दुबली, पतली और उजली सी’ की खिड़की, ‘आज मेरे अंदर रुकी हुई एक नदी’ की नदी, ‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’ का खालीपन, ‘कैमरा’ की असमर्थ स्मृति और ‘बनारस के घाट’ का सांस्कृतिक भूगोल इसी क्षमता के उदाहरण हैं।
अंततः ‘इस बार तुम्हारे शहर में’ उस मनुष्य की कविता है जो अपने संबंधों को केवल जीता नहीं, उन्हें स्मृति में बचाकर भी रखना चाहता है। उसके लिए प्रेम किसी एक क्षण की घटना नहीं है। वह मनुष्य की भाषा, वस्तुओं, यात्राओं, शहरों और स्मृतियों में फैलता चला जाता है।
इसीलिए संग्रह का ‘शहर’ केवल एक शहर नहीं रह जाता।
वह एक व्यक्ति की स्मृति बन जाता है।
और ‘तुम’ केवल एक व्यक्ति नहीं रहती।
वह उस पूरे भावात्मक संसार का नाम बन जाती है जिसके बिना कवि का ‘मैं’ स्वयं को अधूरा अनुभव करता है।
यही इस संग्रह की केंद्रीय उपलब्धि है और यही उसकी साहित्यिक पहचान भी।
‘इस बार तुम्हारे शहर में’ की कविताएँ अंततः यह विश्वास व्यक्त करती हैं कि मनुष्य जिन लोगों को सच्चे अर्थों में अपने जीवन में स्थान देता है, वे उससे दूर जाने के बाद भी पूरी तरह नहीं जाते। वे किसी रास्ते, किसी शहर, किसी तस्वीर, किसी वस्तु, किसी मौसम और कभी-कभी किसी कविता में लौटते रहते हैं।
और संभवतः कविता का एक महत्वपूर्ण कार्य यही है—
जो जीवन में छूट गया है, उसे शब्दों में पूरी तरह खोने से बचा लेना।

