अपना दृष्टिकोण बदलना होगा ।

सेमिनारों /संगोष्ठियों को लेकर अब मुझे लगता है कि हमें अपना दृष्टिकोण बदलना होगा । हमें यह समझना होगा कि आयोजक हमारा रिश्तेदार नहीं है जो वो हमारी अगवानी में बिछा पड़ा रहे । यह एक शैक्षणिक कार्य है ना की पारिवारिक समारोह ।
भाग लेना हमारी शैक्षणिक जरुरत भी है और जिम्मेदारी भी । हम मुफ्तखोरी से अपने आप को बचाएं और आयोजकों को भी तो शायद इस तरह के आयोजन अधिक सहज सरल और महत्वपूर्ण बन सकेंगे । 
इधर विदेशों के कुछ आयोजकों द्वारा आयोजित संगोष्ठियों को देखकर दंग रह गया ।
आप बीज वक्ता हों तब भी आप को पंजीकरण करवाना है और आने जाने,रहने खाने का व्यय भी खुद करना है । 
इतनी सादगी से आयोजन होते हैं क़ि क्या कहूं । शायद यही सही तरीका भी हो ।

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